एक बार किसी गुरु से उसके शिष्य ने पूछा मैं जानना चाहता हुं कि स्वर्ग व नरक कैसे हैं? उसे गुरु ने कहा आंखे बंद करों और देखों। शिष्य ने आंखे बंद की और शांत शुन्यता में चला गया। गुरु ने कहा अब स्वर्ग देखों और थोड़ी देर बाद कहा अब नर्क देखों। उसके थोड़ी देर बाद गुरु ने पूछा- क्या देखा? वह बोला स्वर्ग में मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा जिसकी लोग चर्चा करते हैं न ही अमृत की नदियां, न स्वर्ण भवन और न ही अप्सराएं। वहां तो कुछ भी नहीं था और नर्क में भी कुछ भी नहीं था न अग्रि की ज्वालाएं, न पीडि़तों का रूदन कुछ भी नहीं।शिष्य ने पूछा- इसका क्या कारण है? मैंने स्वर्ग देखा या नहीं देखा? गुरु हंसे और बोले- निश्चय ही तुमने स्वर्ग और नर्क देखे हैं लेकिन अमृत की नदियां, अप्सराएं, स्वर्ण भवन, पीड़ा व रूदन तुझे स्वयं वहां ले जाने होंगे। वे वहां नहीं मिलते जो हम अपने साथ ले जाते हैं वही वहां उपलब्ध हो जाता हैं। हम ही स्वर्ग हैं, हम ही नर्क । व्यक्ति जो अपने अंदर रखता है, वही अपने बाहर पाता है। भीतर स्वर्ग है तो बाहर स्वर्ग है और भीतर नर्क हो तो बाहर नर्क है। स्वयं में ही सब कुछ छुपा है।
पुराणों मे शिवरात्रि का वर्णन और महत्व
महाशिवरात्रि का मूल
पुराणों में महाशिवरात्रि को लेकर कई तरह के वृत्तांत हैं। जिसमें सबसे अधिक प्रचलित है शिकारी द्वारा अनजाने में की गई शिवरात्रि की कथा । लेकिन यह कथा शिवरात्रि के व्रतफल की कथा है न कि इसकी मूल कथा। मूल कथा कुछ इस प्रकार है -शिव परंब्रह्म हैं। सृष्टि उनकी ही परिकल्पना है सृष्टि के अस्तित्व में आने के पहले चारों और सर्वव्यापक अन्धकार होता है। तब शिव सृष्टि की परिकल्पना करते हैं। ब्रह्माण्ड की रचना करते हैं, त्रिदेवों का गठन होता है। तथा सृष्टि अस्तित्व में आती है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्य रात्रि परंब्रह्म शिव का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। जब कल्प के समाप्ति पर शिव सृष्टि को विलीन कर देतें हैं तो एक बार फिर रह जाता है – सिर्फ अन्धकार। ऐसे ही एक अवसर पर (जब पूरी सृष्टि अँधकार में डूबी हुई थी) पार्वतीजी ने शिवजी की पूर्ण मनोयोग से साधना की। शिव जी ने प्रसन्न होकर पार्वती जी को वर दिया। पार्वतीजी ने महादेव से यह वर मांगा कि जो कोई भी इस दिन अगर आपकी साधना करे तो आप उस पर प्रसन्न हो जांए तथा मनवांछित वर प्रदान करें। इस प्रकार पार्वती जी के वर के प्रभाव से शिवरात्रि का प्रारम्भ हुआ।
एक कथा यह भी है कि एक बार ब्रह्मा एवं विष्णु में विवाद हो गया कि उनमें से श्रेष्ठ कौन है, तब शिव एक प्रकाश स्तम्भ (लिंग) के रूप में प्रगट हुए। ब्रह्मा एवं विष्णु ने उस स्तंभ के आदि तथा अंत की खोज में जुट गए। पर आदि तथा अंत रहित महादेव के रहस्य को कौन जान सकता था। इसके लिए ब्रह्मा ने मिथ्या का सहारा लिया तो शिव ने क्रोधित होकर ब्रह्मा का पांचवा सर काट लिया। शिव के क्रोध को शांत करने के लिया विष्णु शिव की स्तुति करने लगे। तब महाशिवरात्रि के अवसर पर शिव उनसे प्रसन्न हुए।
एक अन्य पुराण कथा के अनुसार जब सागर मंथन के समय सागर से कालकेतु विष निकला तब शिव ने संसार के रक्षा हेतु सम्पूर्ण विष का पान कर लिया और नीलकंठ कहलाए। इसी अवसर को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर ही शिव-पार्वती का विवाह भी सम्पन्न हुआ था। फाल्गुन कृष्ण-चतुर्दशी की महानिशा में आदिदेव कोटि सूर्यसमप्रभ शिवलिंग के रुप में आविर्भूत हुए थे। फाल्गुन के पश्चात वर्ष चक्र की भी पुनरावृत्ति होती है अत: फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को पूजा करना एक महाव्रत है जिसका नाम महाशिवरात्रि व्रत पड़ा। इस तरह शिव और पार्वती को लेकर कई कथाएं आदि काल से हमारे देश में प्रचलित हैं।
व्रत करने की विधि
व्रत को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें तथा भोग विलास से भी दूर रहें । प्रात: लकड़ी का दातुन तथा पेस्ट का उपयोग न करें; नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और उँगली से कंठ शुद्ध कर लें । वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी वर्जित है, अत: स्वयं गिरे हुए पत्ते का सेवन करे । यदि यह सम्भव न हो तो पानी से बारह कुल्ले कर लें । फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर पूजा पाठ करें या पुरोहितादि से कथा सत्संग आदि श्रवण करें । प्रभु के सामने इस प्रकार प्रण करना चाहिए कि: ‘आज मैं चोर, पाखण्डी और दुराचारी मनुष्य से बात नहीं करुँगा और न ही किसीका दिल दुखाऊँगा । गौ, ब्राह्मण आदि को फलाहार व अन्नादि देकर प्रसन्न करुँगा । रात्रि को जागरण कर कीर्तन करुँगा , इष्ट मंत्र अथवा गुरुमंत्र का जाप करुँगा, राम, कृष्ण , नारायण इत्यादि ईश्वर के नामों को कण्ठ का भूषण बनाऊँगा ।’ – ऐसी प्रतिज्ञा करके भगवान का स्मरण कर प्रार्थना करें कि : ‘हे त्रिलोकपति ! मेरी लाज आपके हाथ है, अत: मुझे इस प्रण को पूरा करने की शक्ति प्रदान करें ।’ मौन, जप, शास्त्र पठन , कीर्तन, रात्रि जागरण व्रत में विशेष लाभ पँहुचाते हैं।
व्रत के दिन अशुद्ध द्रव्य से बने पेय न पीयें । कोल्ड ड्रिंक्स, एसिड आदि डाले हुए फलों के डिब्बाबंद रस को न पीयें । दो बार भोजन न करें । आइसक्रीम व तली हुई चीजें न खायें । फल अथवा घर में निकाला हुआ फल का रस अथवा थोड़े दूध या जल पर रहना विशेष लाभदायक है । व्रत के दिनों में काँसे के बर्तन, मांस, प्याज, लहसुन, मसूर, उड़द, चने, कोदो (एक प्रकार का धान), शाक, शहद, तेल और अत्यम्बुपान (अधिक जल का सेवन) – इनका सेवन न करें । व्रत के दिन हविष्यान्न (जौ, गेहूँ, मूँग, सेंधा नमक, कालीमिर्च, शर्करा और गोघृत आदि) का एक बार भोजन करें।
फलाहारी को गोभी, गाजर, शलजम, पालक, कुलफा का साग इत्यादि सेवन नहीं करना चाहिए । आम, अंगूर, केला, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करना चाहिए ।
जुआ, निद्रा, पान, दातुन, परायी निन्दा, चुगली, चोरी, हिंसा, मैथुन, क्रोध तथा झूठ, कपटादि अन्य कुकर्मों से नितान्त दूर रहना चाहिए । बैल की पीठ पर सवारी न करें ।
भूलवश किसी निन्दक से बात हो जाय तो इस दोष को दूर करने के लिए भगवान सूर्य के दर्शन तथा धूप दीप से श्रीहरि की पूजा कर क्षमा माँग लेनी चाहिए । व्रत के दिन घर में झाडू नहीं लगायें, इससे चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है । इस दिन बाल नहीं कटायें । मधुर बोलें, अधिक न बोलें, अधिक बोलने से न बोलने योग्य वचन भी निकल जाते हैं । सत्य भाषण करना चाहिए । इस दिन यथाशक्ति अन्नदान करें किन्तु स्वयं किसीका दिया हुआ अन्न कदापि ग्रहण न करें । प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करनी चाहिए ।
व्रत के दिन किसी सम्बन्धी की मृत्यु हो जाय तो उस दिन व्रत रखकर उसका फल संकल्प करके मृतक को देना चाहिए और श्रीगंगाजी में पुष्प (अस्थि) प्रवाहित करने पर भी व्रत रखकर व्रत फल प्राणी के निमित्त दे देना चाहिए । प्राणिमात्र को अन्तर्यामी का अवतार समझकर किसीसे छल कपट नहीं करना चाहिए । अपना अपमान करने या कटु वचन बोलनेवाले पर भूलकर भी क्रोध नहीं करें । सन्तोष का फल सर्वदा मधुर होता है । मन में दया रखनी चाहिए ।
व्रत खोलने की विधि :
व्रत को खोलते समय सेवापूजा की जगह पर बैठकर भुने हुए सात चनों के चौदह टुकड़े करके अपने सिर के पीछे फेंकना चाहिए । ‘मेरे सात जन्मों के शारीरिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हुए’ – यह भावना करके सात अंजलि जल पीना और चने के सात दाने खाकर व्रत खोलना चाहिए । व्रत के दिन ब्राह्मणों को मिष्टान्न, दक्षिणादि से प्रसन्न कर उनकी परिक्रमा कर लेनी चाहिए । इस विधि से व्रत करनेवाला उत्तम फल को प्राप्त करता है ।
नवरात्र के नैवेध
प्रथम नवरात्र के दिन माँ के चरणों में गाय का शुद्ध घी अर्पित करना चाहिए ।
दुसरे को शक्कर का भोग लगाकर घर में सभी सदस्यों को दें , इससे आयु वृद्धि होती है ।
तृतीय को दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाने से दुखों से मुक्ति मिलती है।
चतुर्थी को माल पुए का भोग लगाने से बुद्धि का विकास होता है ।
पंचमी को केले का नैवेध चढ़ाने से शरीर स्वस्थ रहता है।
षष्ठी को शहद का भोग लगाने से आकर्षण शक्ति में वृद्धि होती है ।
सप्तमी को गुड का भोग लगाने से शोक की निवृत्ति होती है ।
अष्टमी को नारियल का भोग लगाने से संतान समबंधी परेशानियों से छुटकारा मिलता है।
नवमी को तिल मृत्यु भय से राहत मिलती है ।
दुसरे को शक्कर का भोग लगाकर घर में सभी सदस्यों को दें , इससे आयु वृद्धि होती है ।
तृतीय को दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाने से दुखों से मुक्ति मिलती है।
चतुर्थी को माल पुए का भोग लगाने से बुद्धि का विकास होता है ।
पंचमी को केले का नैवेध चढ़ाने से शरीर स्वस्थ रहता है।
षष्ठी को शहद का भोग लगाने से आकर्षण शक्ति में वृद्धि होती है ।
सप्तमी को गुड का भोग लगाने से शोक की निवृत्ति होती है ।
अष्टमी को नारियल का भोग लगाने से संतान समबंधी परेशानियों से छुटकारा मिलता है।
नवमी को तिल मृत्यु भय से राहत मिलती है ।
वाल्मीकि द्वारा श्रीगणेश का स्तवन
| आदिकवि वाल्मीकि द्वारा श्रीगणेश का स्तवन |
| चतु:षष्टिकोटयाख्यविद्याप्रदं त्वां सुराचार्यविद्याप्रदानापदानम्। कठाभीष्टविद्यार्पकं दन्तयुग्मं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥ गणेश्वर! आप चौंसठ कोटि विद्याओं के दाता तथा देवताओं के आचार्य बृहस्पति को भी विद्या-प्रदान का कार्य पूर्ण करनेवाले हैं। कठ को अभीष्ट विद्या देनेवाले भी आप ही हैं। (अथवा आप कठोपनिषद्रूपा अभीष्ट विद्या के दाता हैं।) आप द्विरद हैं, कवि हैं और कवियों की बुद्धि के स्वामी हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ। स्वनाथं प्रधानं महाविघन्नाथं निजेच्छाविसृष्टाण्डवृन्देशनाथम्। प्रभुं दक्षिणास्यस्य विद्याप्रदं त्वां कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥ आप ही अपने स्वामी एवं प्रधान हैं। बडे-बडे विघनें के नाथ हैं। स्वेच्छा से रचित ब्रह्माण्ड-समूह के स्वामी और रक्षक भी आप ही हैं। आप दक्षिणास्य के प्रभु एवं विद्यादाता हैं। आप कवि हैं एवं कवियों के लिए बुद्धिनाथ हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ। विभो व्यासशिष्यादिविद्याविशिष्टप्रियानेकविद्याप्रदातारमाद्यम्। महाशाक्तदीक्षागुरुं श्रेष्ठदं त्वां कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥ विभो! आप व्यास-शिष्य आदि विद्याविशिष्ट प्रियजनों को अनेक विद्या प्रदान करनेवाले और सबके आदि पुरुष हैं। महाशाक्त -मन्त्र की दीक्षा के गुरु एवं श्रेष्ठ वस्तु प्रदान करनेवाले आप कवि एवं कवियों के बुद्धिनाथ को मैं प्रणाम करता हूँ। विधात्रे त्रयीमुख्यवेदांश्च योगं महाविष्णवे चागमाञ्ा् शंकराय। दिशन्तं च सूर्याय विद्यारहस्यं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥ जो विधाता (ब्रह्माजी) को वेदत्रयी के नाम से प्रसिद्ध मुख्य वेदों का, महाविष्णु को योग का, शंकर को आगमों का और सूर्यदेव को विद्या के रहस्य का उपदेश देते हैं, उन कवियों के बुद्धिनाथ एवं कवि गणेशजी को मैं नमस्कार करता हूँ। महाबुद्धिपुत्राय चैकं पुराणं दिशन्तं गजास्यस्य माहात्म्ययुक्तम्। निजज्ञानशक्त्या समेतं पुराणं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥ महाबुद्धि-देवी के पुत्र के प्रति गजानन के माहात्म्य से युक्त तथा निज ज्ञानशक्ति से सम्पन्न एक पुराण का उपदेश देनेवाले गणेश को, जो कवि एवं कवियों के बुद्धिनाथ हैं, मैं प्रणाम करता हूँ। त्रयीशीर्षसारं रुचानेकमारं रमाबुद्धिदारं परं ब्रह्मपारम्। सुरस्तोमकायं गणौघाधिनाथं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥ जो वेदान्त के सारतत्त्व, अपने तेज से अनेक असुरों का संहार करनेवाले, सिद्धि-लक्ष्मी एवं बुद्धि को दारा के रूप में अङ्गीकार करनेवाले और परात्पर ब्रह्मस्वरूप हैं; देवताओं का समुदाय जिनका शरीर है तथा जो गण-समुदाय के अधीश्वर हैं उन कवि एवं कवियों के बुद्धिनाथ गणेश को मैं नमस्कार करता हूँ। चिदानन्दरूपं मुनिध्येयरूपं गुणातीतमीशं सुरेशं गणेशम्। धरानन्दलोकादिवासप्रियं त्वां कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥ जो ज्ञानानन्दस्वरूप, मुनियों के ध्येय तथा गुणातीत हैं; धरा एवं स्वानन्दलोक आदि का निवास जिन्हें प्रिय हैं; उन ईश्वर, सुरेश्वर, कवि तथा कवियों के बुद्धिनाथ गणेश को मैं प्रणाम करता हूँ। अनेकप्रतारं सुरक्ताब्जहारं परं निर्गुणं विश्वसद्ब्रह्मरूपम्। महावाक्यसंदोहतात्पर्यमूर्ति कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥ जो अनेकानेक भक्तजनों को भव-सागर से पार करनेवाले हैं; लाल कमल के फूलों का हार धारण करते हैं; परम निर्गुण हैं; विश्वात्मक सद्ब्रह्म जिनका रूप है; तत्त्वमसि आदि महावाक्यों के समूह का तात्पर्य जिनका श्रीविग्रह है, उन कवि एवं कवियों के बुद्धिनाथ गणेश को मैं नमस्कार करता हूँ। इदं ये तु कव्यष्टकं भक्तियुक्तास्त्रिसंध्यं पठन्ते गजास्यं स्मरन्त:। कवित्वं सुवाक्यार्थमत्यद्भुतं ते लभन्ते प्रसादाद् गणेशस्य मुक्तिम्॥ जो भक्ति -भाव से युक्त हो तीनों संध्याओं के समय गजानन का स्मरण करते हुए इस कव्यष्टक का पाठ करते हैं, वे गणेशजी के कृपा-प्रसाद से कवित्व, सुन्दर एवं अद्भुत वाक्यार्थ तथा मानव-जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं। |
गणपति अथर्वशीर्ष
गणपति अथर्वशीर्ष
॥ श्री गणपत्यथर्वशीर्ष ॥
॥ शान्ति पाठ ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः । व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ तन्मामवतु तद् वक्तारमवतु अवतु माम् अवतु वक्तारम्
ॐ शांतिः । शांतिः ॥ शांतिः॥।
॥ उपनिषत् ॥
॥हरिः ॐ नमस्ते गणपतये ॥
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्ताऽसि। त्वमेव केवलं धर्ताऽसि। त्वमेव केवलं हर्ताऽसि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ॥ १॥
गणपति को नमस्कार है, तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्त्व हो, तुम्हीं केवल कर्त्ता, तुम्हीं केवल धारणकर्ता और तुम्हीं केवल संहारकर्ता हो, तुम्हीं केवल समस्त विश्वरुप ब्रह्म हो और तुम्हीं साक्षात् नित्य आत्मा हो।
॥ स्वरूप तत्त्व ॥
ऋतं वच्मि (वदिष्यामि)॥ सत्यं वच्मि (वदिष्यामि)॥ २॥
यथार्थ कहता हूँ। सत्य कहता हूँ।
अव त्वं माम् । अव वक्तारम् । अव श्रोतारम् । अव दातारम् । अव धातारम् । अवानूचानमव शिष्यम् । अव पश्चात्तात् । अव पुरस्तात् । अवोत्तरात्तात् । अव दक्षिणात्तात् । अव चोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्। सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात् ॥३॥
तुम मेरी रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो। श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाता की रक्षा करो। षडंग वेदविद् आचार्य की रक्षा करो। शिष्य रक्षा करो। पीछे से रक्षा करो। आगे से रक्षा करो। उत्तर (वाम भाग) की रक्षा करो। दक्षिण भाग की रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे की ओर से रक्षा करो। सर्वतोभाव से मेरी रक्षा करो। सब दिशाओं से मेरी रक्षा करो।
त्वं वाङ्ग्मयस्त्वं चिन्मयः। त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममयः। त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥४॥
तुम वाङ्मय हो, तुम चिन्मय हो। तुम आनन्दमय हो। तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानन्द अद्वितीय परमात्मा हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम ज्ञानमय हो, विज्ञानमय हो।
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति। सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति। त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः। त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥ ५॥
यह सारा जगत् तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत् तुमसे सुरक्षित रहता है। यह सारा जगत् तुममें लीन होता है। यह अखिल विश्व तुममें ही प्रतीत होता है। तुम्हीं भूमि, जल, अग्नि और आकाश हो। तुम्हीं परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी चतुर्विध वाक् हो।
त्वं गुणत्रयातीतः त्वमवस्थात्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः। त्वं मूलाधारः स्थिथोऽसि नित्यम्। त्वं शक्तित्रयात्मकः। त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम्। त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम् ॥ ६॥
तुम सत्त्व-रज-तम-इन तीनों गुणों से परे हो। तुम भूत-भविष्य-वर्तमान-इन तीनों कालों से परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म और कारण- इन तीनों देहों से परे हो। तुम नित्य मूलाधार चक्र में स्थित हो। तुम प्रभु-शक्ति, उत्साह-शक्ति और मन्त्र-शक्ति- इन तीनों शक्तियों से संयुक्त हो। योगिजन नित्य तुम्हारा ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो। तुम विष्णु हो। तुम रुद्र हो। तुम इन्द्र हो। तुम अग्नि हो। तुम वायु हो। तुम सूर्य हो। तुम चन्द्रमा हो। तुम (सगूण) ब्रह्म हो, तुम (निर्गुण) त्रिपाद भूः भुवः स्वः एवं प्रणव हो।
॥ गणेश मंत्र ॥
गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरम्।अनुस्वारः परतरः। अर्धेन्दुलसितम्। तारेण ऋद्धम्। एतत्तव मनुस्वरूपम्। गकारः पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्। अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरुत्तररूपम्। नादः संधानम्। संहितासंधिः। सैषा गणेशविद्या। गणकऋषिः। निचृद्गायत्रीच्छंदः। गणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः ॥ ७॥
‘गण’ शब्द के आदि अक्षर गकार का पहले उच्चारण करके अनन्तर आदिवर्ण अकार का उच्चारण करें। उसके बाद अनुस्वार रहे। इस प्रकार अर्धचन्द्र से पहले शोभित जो ‘गं’ है, वह ओंकार के द्वारा रुद्ध हो, अर्थात् उसके पहले और पीछे भी ओंकार हो। यही तुम्हारे मन्त्र का स्वरुप (ॐ गं ॐ) है। ‘गकार’ पूर्वरुप है, ‘अकार’ मध्यमरुप है, ‘अनुस्वार’ अन्त्य रुप है। ‘बिन्दु’ उत्तररुप है। ‘नाद’ संधान है। संहिता’ संधि है। ऐसी यह गणेशविद्या है। इस विद्या के गणक ऋषि हैं। निचृद् गायत्री छन्द है और गणपति देवता है। मन्त्र है- ‘ॐ गं गणपतये नमः”
॥ गणेश गायत्री ॥
एकदंताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दंतिः प्रचोदयात् ॥ ८॥
एकदन्त को हम जानते हैं, वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। दन्ती हमको उस ज्ञान और ध्यान में प्रेरित करें।
॥ गणेश रूप (ध्यानम्)॥
एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम् ॥
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् ॥
रक्तगंधानुलिप्तांगं रक्तपुष्पैः सुपूजितम् ॥
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् ॥
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् ॥
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥ ९॥
गणपतिदेव एकदन्त और चर्तुबाहु हैं। वे अपने चार हाथों में पाश, अंकुश, दन्त और वरमुद्रा धारण करते हैं। उनके ध्वज में मूषक का चिह्न है। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा रक्तवस्त्रधारी हैं। रक्तचन्दन के द्वारा उनके अंग अनुलिप्त हैं। वे रक्तवर्ण के पुष्पों द्वारा सुपूजित हैं। भक्तों की कामना पूर्ण करने वाले, ज्योतिर्मय, जगत् के कारण, अच्युत तथा प्रकृति और पुरुष से परे विद्यमान वे पुरुषोत्तम सृष्टि के आदि में आविर्भूत हुए। इनका जो इस प्रकार नित्य ध्यान करता है, वह योगी योगियों में श्रेष्ठ है।
॥ अष्ट नाम गणपति ॥
नमो व्रातपतये । नमो गणपतये । नमः प्रमथपतये । नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय । विघ्ननाशिने शिवसुताय । श्रीवरदमूर्तये नमो नमः ॥ १०॥
व्रातपति, गणपति, प्रमथपति, लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशक, शिवतनय तथा वरदमूर्ति को नमस्कार है।
॥ फलश्रुति ॥
एतदथर्वशीर्षं योऽधीते ॥ स ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ स सर्वतः सुखमेधते ॥ स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते ॥ स पंचमहापापात्प्रमुच्यते ॥ सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति ॥ प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति ॥ सायंप्रातः प्रयुंजानो अपापो भवति ॥ सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति ॥ धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति ॥ इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम् ॥ यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ॥ ११॥
इस अथर्वशीर्ष का जो पाठ करता है, वह ब्रह्मीभूत होता है, वह किसी प्रकार के विघ्नों से बाधित नहीं होता, वह सर्वतोभावेन सुखी होता है, वह पंच महापापों से मुक्त हो जाता है। सायंकाल इसका अध्ययन करनेवाला दिन में किये हुए पापों का नाश करता है, प्रातःकाल पाठ करनेवाला रात्रि में किये हुए पापों का नाश करता है। सायं और प्रातःकाल पाठ करने वाला निष्पाप हो जाता है। (सदा) सर्वत्र पाठ करनेवाले सभी विघ्नों से मुक्त हो जाता है एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करता है। यह अथर्वशीर्ष इसको नहीं देना चाहिये, जो शिष्य न हो। जो मोहवश अशिष्य को उपदेश देगा, वह महापापी होगा। इसकी १००० आवृत्ति करने से उपासक जो कामना करेगा, इसके द्वारा उसे सिद्ध कर लेगा।
(विविध प्रयोग)
अनेन गणपतिमभिषिंचति स वाग्मी भवति ॥ चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान् भवति ।
स यशोवान् भवति ॥ इत्यथर्वणवाक्यम् ॥ ब्रह्माद्याचरणं विद्यात् न बिभेति कदाचनेति ॥ १२॥
जो इस मन्त्र के द्वारा श्रीगणपति का अभिषेक करता है, वह वाग्मी हो जाता है। जो चतुर्थी तिथि में उपवास कर जप करता है, वह विद्यावान् हो जाता है। यह अथर्वण-वाक्य है। जो ब्रह्मादि आवरण को जानता है, वह कभी भयभीत नहीं होता।
(यज्ञ प्रयोग)
यो दूर्वांकुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति ॥ यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति ॥ स मेधावान् भवति ॥ यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति ॥ यः साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते ॥ १३॥
जो दुर्वांकुरों द्वारा यजन करता है, वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजा के द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी होता है, वह मेधावान होता है। जो सहस्त्र मोदकों के द्वारा यजन करता है, वह मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है। जो घृताक्त समिधा के द्वारा हवन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है।
(अन्य प्रयोग)
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति ॥ सूर्यगृहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमंत्रो भवति ॥ महाविघ्नात्प्रमुच्यते ॥ महादोषात्प्रमुच्यते ॥ महापापात् प्रमुच्यते ॥ स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति ॥ य एवं वेद इत्युपनिषत् ॥ १४॥
जो आठ ब्राह्मणों को इस उपनिषद् का सम्यक ग्रहण करा देता है, वह सूर्य के समान तेज-सम्पन्न होता है। सूर्यग्रहण के समय महानदी में अथवा प्रतिमा के निकट इस उपनिषद् का जप करके साधक सिद्धमन्त्र हो जाता है। सम्पूर्ण महाविघ्नों से मुक्त हो जाता है। महापापों से मुक्त हो जाता है। महादोषों से मुक्त हो जाता है। वह सर्वविद् हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है-वह सर्वविद् हो जाता है।
॥ शान्ति मंत्र ॥
ॐ सहनाववतु ॥ सहनौभुनक्तु ॥ सह वीर्यं करवावहै ॥ तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥ स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शांतिः । शांतिः ॥ शांतिः ॥।
॥ शान्ति पाठ ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः । व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ तन्मामवतु तद् वक्तारमवतु अवतु माम् अवतु वक्तारम्
ॐ शांतिः । शांतिः ॥ शांतिः॥।
॥ उपनिषत् ॥
॥हरिः ॐ नमस्ते गणपतये ॥
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्ताऽसि। त्वमेव केवलं धर्ताऽसि। त्वमेव केवलं हर्ताऽसि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ॥ १॥
गणपति को नमस्कार है, तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्त्व हो, तुम्हीं केवल कर्त्ता, तुम्हीं केवल धारणकर्ता और तुम्हीं केवल संहारकर्ता हो, तुम्हीं केवल समस्त विश्वरुप ब्रह्म हो और तुम्हीं साक्षात् नित्य आत्मा हो।
॥ स्वरूप तत्त्व ॥
ऋतं वच्मि (वदिष्यामि)॥ सत्यं वच्मि (वदिष्यामि)॥ २॥
यथार्थ कहता हूँ। सत्य कहता हूँ।
अव त्वं माम् । अव वक्तारम् । अव श्रोतारम् । अव दातारम् । अव धातारम् । अवानूचानमव शिष्यम् । अव पश्चात्तात् । अव पुरस्तात् । अवोत्तरात्तात् । अव दक्षिणात्तात् । अव चोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्। सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात् ॥३॥
तुम मेरी रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो। श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाता की रक्षा करो। षडंग वेदविद् आचार्य की रक्षा करो। शिष्य रक्षा करो। पीछे से रक्षा करो। आगे से रक्षा करो। उत्तर (वाम भाग) की रक्षा करो। दक्षिण भाग की रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे की ओर से रक्षा करो। सर्वतोभाव से मेरी रक्षा करो। सब दिशाओं से मेरी रक्षा करो।
त्वं वाङ्ग्मयस्त्वं चिन्मयः। त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममयः। त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥४॥
तुम वाङ्मय हो, तुम चिन्मय हो। तुम आनन्दमय हो। तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानन्द अद्वितीय परमात्मा हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम ज्ञानमय हो, विज्ञानमय हो।
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति। सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति। त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः। त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥ ५॥
यह सारा जगत् तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत् तुमसे सुरक्षित रहता है। यह सारा जगत् तुममें लीन होता है। यह अखिल विश्व तुममें ही प्रतीत होता है। तुम्हीं भूमि, जल, अग्नि और आकाश हो। तुम्हीं परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी चतुर्विध वाक् हो।
त्वं गुणत्रयातीतः त्वमवस्थात्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः। त्वं मूलाधारः स्थिथोऽसि नित्यम्। त्वं शक्तित्रयात्मकः। त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम्। त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम् ॥ ६॥
तुम सत्त्व-रज-तम-इन तीनों गुणों से परे हो। तुम भूत-भविष्य-वर्तमान-इन तीनों कालों से परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म और कारण- इन तीनों देहों से परे हो। तुम नित्य मूलाधार चक्र में स्थित हो। तुम प्रभु-शक्ति, उत्साह-शक्ति और मन्त्र-शक्ति- इन तीनों शक्तियों से संयुक्त हो। योगिजन नित्य तुम्हारा ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो। तुम विष्णु हो। तुम रुद्र हो। तुम इन्द्र हो। तुम अग्नि हो। तुम वायु हो। तुम सूर्य हो। तुम चन्द्रमा हो। तुम (सगूण) ब्रह्म हो, तुम (निर्गुण) त्रिपाद भूः भुवः स्वः एवं प्रणव हो।
॥ गणेश मंत्र ॥
गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरम्।अनुस्वारः परतरः। अर्धेन्दुलसितम्। तारेण ऋद्धम्। एतत्तव मनुस्वरूपम्। गकारः पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्। अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरुत्तररूपम्। नादः संधानम्। संहितासंधिः। सैषा गणेशविद्या। गणकऋषिः। निचृद्गायत्रीच्छंदः। गणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः ॥ ७॥
‘गण’ शब्द के आदि अक्षर गकार का पहले उच्चारण करके अनन्तर आदिवर्ण अकार का उच्चारण करें। उसके बाद अनुस्वार रहे। इस प्रकार अर्धचन्द्र से पहले शोभित जो ‘गं’ है, वह ओंकार के द्वारा रुद्ध हो, अर्थात् उसके पहले और पीछे भी ओंकार हो। यही तुम्हारे मन्त्र का स्वरुप (ॐ गं ॐ) है। ‘गकार’ पूर्वरुप है, ‘अकार’ मध्यमरुप है, ‘अनुस्वार’ अन्त्य रुप है। ‘बिन्दु’ उत्तररुप है। ‘नाद’ संधान है। संहिता’ संधि है। ऐसी यह गणेशविद्या है। इस विद्या के गणक ऋषि हैं। निचृद् गायत्री छन्द है और गणपति देवता है। मन्त्र है- ‘ॐ गं गणपतये नमः”
॥ गणेश गायत्री ॥
एकदंताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दंतिः प्रचोदयात् ॥ ८॥
एकदन्त को हम जानते हैं, वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। दन्ती हमको उस ज्ञान और ध्यान में प्रेरित करें।
॥ गणेश रूप (ध्यानम्)॥
एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम् ॥
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् ॥
रक्तगंधानुलिप्तांगं रक्तपुष्पैः सुपूजितम् ॥
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् ॥
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् ॥
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥ ९॥
गणपतिदेव एकदन्त और चर्तुबाहु हैं। वे अपने चार हाथों में पाश, अंकुश, दन्त और वरमुद्रा धारण करते हैं। उनके ध्वज में मूषक का चिह्न है। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा रक्तवस्त्रधारी हैं। रक्तचन्दन के द्वारा उनके अंग अनुलिप्त हैं। वे रक्तवर्ण के पुष्पों द्वारा सुपूजित हैं। भक्तों की कामना पूर्ण करने वाले, ज्योतिर्मय, जगत् के कारण, अच्युत तथा प्रकृति और पुरुष से परे विद्यमान वे पुरुषोत्तम सृष्टि के आदि में आविर्भूत हुए। इनका जो इस प्रकार नित्य ध्यान करता है, वह योगी योगियों में श्रेष्ठ है।
॥ अष्ट नाम गणपति ॥
नमो व्रातपतये । नमो गणपतये । नमः प्रमथपतये । नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय । विघ्ननाशिने शिवसुताय । श्रीवरदमूर्तये नमो नमः ॥ १०॥
व्रातपति, गणपति, प्रमथपति, लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशक, शिवतनय तथा वरदमूर्ति को नमस्कार है।
॥ फलश्रुति ॥
एतदथर्वशीर्षं योऽधीते ॥ स ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ स सर्वतः सुखमेधते ॥ स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते ॥ स पंचमहापापात्प्रमुच्यते ॥ सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति ॥ प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति ॥ सायंप्रातः प्रयुंजानो अपापो भवति ॥ सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति ॥ धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति ॥ इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम् ॥ यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ॥ ११॥
इस अथर्वशीर्ष का जो पाठ करता है, वह ब्रह्मीभूत होता है, वह किसी प्रकार के विघ्नों से बाधित नहीं होता, वह सर्वतोभावेन सुखी होता है, वह पंच महापापों से मुक्त हो जाता है। सायंकाल इसका अध्ययन करनेवाला दिन में किये हुए पापों का नाश करता है, प्रातःकाल पाठ करनेवाला रात्रि में किये हुए पापों का नाश करता है। सायं और प्रातःकाल पाठ करने वाला निष्पाप हो जाता है। (सदा) सर्वत्र पाठ करनेवाले सभी विघ्नों से मुक्त हो जाता है एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करता है। यह अथर्वशीर्ष इसको नहीं देना चाहिये, जो शिष्य न हो। जो मोहवश अशिष्य को उपदेश देगा, वह महापापी होगा। इसकी १००० आवृत्ति करने से उपासक जो कामना करेगा, इसके द्वारा उसे सिद्ध कर लेगा।
(विविध प्रयोग)
अनेन गणपतिमभिषिंचति स वाग्मी भवति ॥ चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान् भवति ।
स यशोवान् भवति ॥ इत्यथर्वणवाक्यम् ॥ ब्रह्माद्याचरणं विद्यात् न बिभेति कदाचनेति ॥ १२॥
जो इस मन्त्र के द्वारा श्रीगणपति का अभिषेक करता है, वह वाग्मी हो जाता है। जो चतुर्थी तिथि में उपवास कर जप करता है, वह विद्यावान् हो जाता है। यह अथर्वण-वाक्य है। जो ब्रह्मादि आवरण को जानता है, वह कभी भयभीत नहीं होता।
(यज्ञ प्रयोग)
यो दूर्वांकुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति ॥ यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति ॥ स मेधावान् भवति ॥ यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति ॥ यः साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते ॥ १३॥
जो दुर्वांकुरों द्वारा यजन करता है, वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजा के द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी होता है, वह मेधावान होता है। जो सहस्त्र मोदकों के द्वारा यजन करता है, वह मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है। जो घृताक्त समिधा के द्वारा हवन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है।
(अन्य प्रयोग)
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति ॥ सूर्यगृहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमंत्रो भवति ॥ महाविघ्नात्प्रमुच्यते ॥ महादोषात्प्रमुच्यते ॥ महापापात् प्रमुच्यते ॥ स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति ॥ य एवं वेद इत्युपनिषत् ॥ १४॥
जो आठ ब्राह्मणों को इस उपनिषद् का सम्यक ग्रहण करा देता है, वह सूर्य के समान तेज-सम्पन्न होता है। सूर्यग्रहण के समय महानदी में अथवा प्रतिमा के निकट इस उपनिषद् का जप करके साधक सिद्धमन्त्र हो जाता है। सम्पूर्ण महाविघ्नों से मुक्त हो जाता है। महापापों से मुक्त हो जाता है। महादोषों से मुक्त हो जाता है। वह सर्वविद् हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है-वह सर्वविद् हो जाता है।
॥ शान्ति मंत्र ॥
ॐ सहनाववतु ॥ सहनौभुनक्तु ॥ सह वीर्यं करवावहै ॥ तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥ स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शांतिः । शांतिः ॥ शांतिः ॥।
॥ इति श्रीगणपत्यथर्वशीर्षं समाप्तम् ॥
देवी कवच/चण्डी कवच
देवी कवच/चण्डी कवच
विनियोग –ॐ अस्य श्रीदेव्या: कवचस्य ब्रह्मा ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, ख्फ्रें चामुण्डाख्या महा-लक्ष्मी: देवता, ह्रीं ह्रसौं ह्स्क्लीं ह्रीं ह्रसौं अंग-न्यस्ता देव्य: शक्तय:, ऐं ह्स्रीं ह्रक्लीं श्रीं ह्वर्युं क्ष्म्रौं स्फ्रें बीजानि, श्रीमहालक्ष्मी-प्रीतये सर्व रक्षार्थे च पाठे विनियोग:।
ऋष्यादि-न्यास –
ब्रह्मर्षये नम: शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नम: मुखे, ख्फ्रें चामुण्डाख्या महा-लक्ष्मी: देवतायै नम: हृदि, ह्रीं ह्रसौं ह्स्क्लीं ह्रीं ह्रसौं अंग-न्यस्ता देव्य: शक्तिभ्यो नम: नाभौ, ऐं ह्स्रीं ह्रक्लीं श्रीं ह्वर्युं क्ष्म्रौं स्फ्रें बीजेभ्यो नम: लिंगे, श्रीमहालक्ष्मी-प्रीतये सर्व रक्षार्थे च पाठे विनियोगाय नम: सर्वांगे।
ध्यान-
ॐ रक्ताम्बरा रक्तवर्णा, रक्त-सर्वांग-भूषणा।
रक्तायुधा रक्त-नेत्रा, रक्त-केशाऽति-भीषणा।।1
रक्त-तीक्ष्ण-नखा रक्त-रसना रक्त-दन्तिका।
पतिं नारीवानुरक्ता, देवी भक्तं भजेज्जनम्।।2
वसुधेव विशाला सा, सुमेरू-युगल-स्तनी।
दीर्घौ लम्बावति-स्थूलौ, तावतीव मनोहरौ।।3
कर्कशावति-कान्तौ तौ, सर्वानन्द-पयोनिधी।
भक्तान् सम्पाययेद् देवी, सर्वकामदुघौ स्तनौ।।4
खड्गं पात्रं च मुसलं, लांगलं च बिभर्ति सा।
आख्याता रक्त-चामुण्डा, देवी योगेश्वरीति च।।5
अनया व्याप्तमखिलं, जगत् स्थावर-जंगमम्।
इमां य: पूजयेद् भक्तो, स व्याप्नोति चराचरम्।।6
।।मार्कण्डेय उवाच।।
ॐॐॐ यद् गुह्यं परमं लोके, सर्व-रक्षा-करं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं, तन्मे ब्रूहि पितामह।।1
।।ब्रह्मोवाच।।
ॐ अस्ति गुह्य-तमं विप्र सर्व-भूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं, तच्छृणुष्व महामुने।।2
प्रथमं शैल-पुत्रीति, द्वितीयं ब्रह्म-चारिणी।
तृतीयं चण्ड-घण्टेति, कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।3
पंचमं स्कन्द-मातेति, षष्ठं कात्यायनी तथा।
सप्तमं काल-रात्रीति, महागौरीति चाष्टमम्।।4
नवमं सिद्धि-दात्रीति, नवदुर्गा: प्रकीर्त्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि, ब्रह्मणैव महात्मना।।5
अग्निना दह्य-मानास्तु, शत्रु-मध्य-गता रणे।
विषमे दुर्गमे वाऽपि, भयार्ता: शरणं गता।।6
न तेषां जायते किंचिदशुभं रण-संकटे।
आपदं न च पश्यन्ति, शोक-दु:ख-भयं नहि।।7
यैस्तु भक्त्या स्मृता नित्यं, तेषां वृद्धि: प्रजायते।
प्रेत संस्था तु चामुण्डा, वाराही महिषासना।।8
ऐन्द्री गज-समारूढ़ा, वैष्णवी गरूड़ासना।
नारसिंही महा-वीर्या, शिव-दूती महाबला।।9
माहेश्वरी वृषारूढ़ा, कौमारी शिखि-वाहना।
ब्राह्मी हंस-समारूढ़ा, सर्वाभरण-भूषिता।।10
लक्ष्मी: पद्मासना देवी, पद्म-हस्ता हरिप्रिया।
श्वेत-रूप-धरा देवी, ईश्वरी वृष वाहना।।11
इत्येता मातर: सर्वा:, सर्व-योग-समन्विता।
नानाभरण-षोभाढया, नाना-रत्नोप-शोभिता:।।12
श्रेष्ठैष्च मौक्तिकै: सर्वा, दिव्य-हार-प्रलम्बिभि:।
इन्द्र-नीलैर्महा-नीलै, पद्म-रागै: सुशोभने:।।13
दृष्यन्ते रथमारूढा, देव्य: क्रोध-समाकुला:।
शंखं चक्रं गदां शक्तिं, हलं च मूषलायुधम्।।14
खेटकं तोमरं चैव, परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं च खड्गं च, शार्गांयुधमनुत्तमम्।।15
दैत्यानां देह नाशाय, भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं, देवानां च हिताय वै।।16
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे ! महाघोर पराक्रमे !
महाबले ! महोत्साहे ! महाभय विनाशिनि।।17
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये ! शत्रूणां भयविर्द्धनि !
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री, आग्नेय्यामग्नि देवता।।18
दक्षिणे चैव वाराही, नैऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारूणी रक्षेद्, वायव्यां वायुदेवता।।19
उदीच्यां दिशि कौबेरी, ऐशान्यां शूल-धारिणी।
ऊर्ध्वं ब्राह्मी च मां रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा।।20
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शव-वाहना।
जया मामग्रत: पातु, विजया पातु पृष्ठत:।।21
अजिता वाम पार्श्वे तु, दक्षिणे चापराजिता।
शिखां मे द्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता।।22
मालाधरी ललाटे च, भ्रुवोर्मध्ये यशस्विनी।
नेत्रायोश्चित्र-नेत्रा च, यमघण्टा तु पार्श्वके।।23
शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये, श्रोत्रयोर्द्वार-वासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्, कर्ण-मूले च शंकरी।।24
नासिकायां सुगन्धा च, उत्तरौष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृत-कला, जिह्वायां च सरस्वती।।25
दन्तान् रक्षतु कौमारी, कण्ठ-मध्ये तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्र-घण्टा च, महामाया च तालुके।।26
कामाख्यां चिबुकं रक्षेद्, वाचं मे सर्व-मंगला।
ग्रीवायां भद्रकाली च, पृष्ठ-वंशे धनुर्द्धरी।।27
नील-ग्रीवा बहि:-कण्ठे, नलिकां नल-कूबरी।
स्कन्धयो: खडि्गनी रक्षेद्, बाहू मे वज्र-धारिणी।।28
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदिम्बका चांगुलीषु च।
नखान् सुरेश्वरी रक्षेत्, कुक्षौ रक्षेन्नरेश्वरी।।29
स्तनौ रक्षेन्महादेवी, मन:-शोक-विनाशिनी।
हृदये ललिता देवी, उदरे शूल-धारिणी।।30
नाभौ च कामिनी रक्षेद्, गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
मेढ्रं रक्षतु दुर्गन्धा, पायुं मे गुह्य-वासिनी।।31
कट्यां भगवती रक्षेदूरू मे घन-वासिनी।
जंगे महाबला रक्षेज्जानू माधव नायिका।।32
गुल्फयोर्नारसिंही च, पाद-पृष्ठे च कौशिकी।
पादांगुली: श्रीधरी च, तलं पाताल-वासिनी।।33
नखान् दंष्ट्रा कराली च, केशांश्वोर्ध्व-केशिनी।
रोम-कूपानि कौमारी, त्वचं योगेश्वरी तथा।।34
रक्तं मांसं वसां मज्जामस्थि मेदश्च पार्वती।
अन्त्राणि काल-रात्रि च, पितं च मुकुटेश्वरी।।35
पद्मावती पद्म-कोषे, कक्षे चूडा-मणिस्तथा।
ज्वाला-मुखी नख-ज्वालामभेद्या सर्व-सन्धिषु।।36
शुक्रं ब्रह्माणी मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं, रक्षेन्मे धर्म-धारिणी।।37
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्र-हस्ता तु मे रक्षेत्, प्राणान् कल्याण-शोभना।।38
रसे रूपे च गन्धे च, शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्वं रजस्तमश्चैव, रक्षेन्नारायणी सदा।।39
आयू रक्षतु वाराही, धर्मं रक्षन्तु मातर:।
यश: कीर्तिं च लक्ष्मीं च, सदा रक्षतु वैष्णवी।।40
गोत्रमिन्द्राणी मे रक्षेत्, पशून् रक्षेच्च चण्डिका।
पुत्रान् रक्षेन्महा-लक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी।।41
धनं धनेश्वरी रक्षेत्, कौमारी कन्यकां तथा।
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमंकरी तथा।।42
राजद्वारे महा-लक्ष्मी, विजया सर्वत: स्थिता।
रक्षेन्मे सर्व-गात्राणि, दुर्गा दुर्गाप-हारिणी।।43
रक्षा-हीनं तु यत् स्थानं, वर्जितं कवचेन च।
सर्वं रक्षतु मे देवी, जयन्ती पाप-नाशिनी।।44
।।फल-श्रुति।।
सर्वरक्षाकरं पुण्यं, कवचं सर्वदा जपेत्।
इदं रहस्यं विप्रर्षे ! भक्त्या तव मयोदितम्।।45
देव्यास्तु कवचेनैवमरक्षित-तनु: सुधी:।
पदमेकं न गच्छेत् तु, यदीच्छेच्छुभमात्मन:।।46
कवचेनावृतो नित्यं, यत्र यत्रैव गच्छति।
तत्र तत्रार्थ-लाभ: स्याद्, विजय: सार्व-कालिक:।।47
यं यं चिन्तयते कामं, तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्नोत्यविकल: पुमान्।।48
निर्भयो जायते मर्त्य:, संग्रामेष्वपराजित:।
त्रैलोक्ये च भवेत् पूज्य:, कवचेनावृत: पुमान्।।49
इदं तु देव्या: कवचं, देवानामपि दुर्लभम्।
य: पठेत् प्रयतो नित्यं, त्रि-सन्ध्यं श्रद्धयान्वित:।।50
देवी वश्या भवेत् तस्य, त्रैलोक्ये चापराजित:।
जीवेद् वर्ष-शतं साग्रमप-मृत्यु-विवर्जित:।।51
नश्यन्ति व्याधय: सर्वे, लूता-विस्फोटकादय:।
स्थावरं जंगमं वापि, कृत्रिमं वापि यद् विषम्।।52
अभिचाराणि सर्वाणि, मन्त्र-यन्त्राणि भू-तले।
भूचरा: खेचराश्चैव, कुलजाश्चोपदेशजा:।।53
सहजा: कुलिका नागा, डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरीक्ष-चरा घोरा, डाकिन्यश्च महा-रवा:।।54
ग्रह-भूत-पिशाचाश्च, यक्ष-गन्धर्व-राक्षसा:।
ब्रह्म-राक्षस-वेताला:, कूष्माण्डा भैरवादय:।।55
नष्यन्ति दर्शनात् तस्य, कवचेनावृता हि य:।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजो-वृद्धि: परा भवेत्।।56
यशो-वृद्धिर्भवेद् पुंसां, कीर्ति-वृद्धिश्च जायते।
तस्माज्जपेत् सदा भक्तया, कवचं कामदं मुने।।57
जपेत् सप्तशतीं चण्डीं, कृत्वा तु कवचं पुर:।
निर्विघ्नेन भवेत् सिद्धिश्चण्डी-जप-समुद्भवा।।58
यावद् भू-मण्डलं धत्ते ! स-शैल-वन-काननम्।
तावत् तिष्ठति मेदिन्यां, जप-कर्तुर्हि सन्तति:।।59
देहान्ते परमं स्थानं, यत् सुरैरपि दुर्लभम्।
सम्प्राप्नोति मनुष्योऽसौ, महा-माया-प्रसादत:।।60
तत्र गच्छति भक्तोऽसौ, पुनरागमनं न हि।
लभते परमं स्थानं, शिवेन सह मोदते ॐॐॐ।।61
।।वाराह-पुराणे श्रीहरिहरब्रह्म विरचितं देव्या: कवचम्।।
श्री कालभैरवाष्टकं
॥ श्री कालभैरवाष्टकं ॥
देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् ।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ।
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥
शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् ।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ४॥
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशनं कर्मपाशमोचकं सुशर्मधायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५॥
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६॥
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपात्तनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७॥
भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८॥
॥ फल श्रुति ॥
कालभैरवाष्टकं पठंति ये मनोहरं ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् ।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम् ॥
इति श्रीमशंकराचार्यविरचितं श्री कालभैरवाष्टकं संपूर्णम् ॥
।। दुर्गासहस्रनामस्तोत्रम् ।।
।। अथ श्री दुर्गासहस्रनामस्तोत्रम् ।।
नारद उवाच -
कुमार गुणगम्भीर देवसेनापते प्रभो ।
सर्वाभीष्टप्रदं पुंसां सर्वपापप्रणाशनम् ।। १।।
गुह्याद्गुह्यतरं स्तोत्रं भक्तिवर्धकमञ्जसा ।
मङ्गलं ग्रहपीडादिशान्तिदं वक्तुमर्हसि ।। २।।
स्कन्द उवाच -
शृणु नारद देवर्षे लोकानुग्रहकाम्यया ।
यत्पृच्छसि परं पुण्यं तत्ते वक्ष्यामि कौतुकात् ।। ३।।
माता मे लोकजननी हिमवन्नगसत्तमात् ।
मेनायां ब्रह्मवादिन्यां प्रादुर्भूता हरप्रिया ।। ४।।
महता तपसाऽऽराध्य शङ्करं लोकशङ्करम् ।
स्वमेव वल्लभं भेजे कलेव हि कलानिधिम् ।। ५।।
नगानामधिराजस्तु हिमवान् विरहातुरः ।
स्वसुतायाः परिक्षीणे वसिष्ठेन प्रबोधितः ।। ६।।
त्रिलोकजननी सेयं प्रसन्ना त्वयि पुण्यतः ।
प्रादुर्भूता सुतात्वेन तद्वियोगं शुभं त्यज ।। ७।।
बहुरूपा च दुर्गेयं बहुनाम्नी सनातनी ।
सनातनस्य जाया सा पुत्रीमोहं त्यजाधुना ।। ८।।
इति प्रबोधितः शैलः तां तुष्टाव परां शिवाम् ।
तदा प्रसन्ना सा दुर्गा पितरं प्राह नन्दिनी ।। ९।।
मत्प्रसादात्परं स्तोत्रं हृदये प्रतिभासताम् ।
तेन नाम्नां सहस्रेण पूजयन् काममाप्नुहि ।। १०।।
इत्युक्त्वान्तर्हितायां तु हृदये स्फुरितं तदा ।
नाम्नां सहस्रं दुर्गायाः पृच्छते मे यदुक्तवान् ।। ११।।
मङ्गलानां मङ्गलं तद् दुर्गानाम सहस्रकम् ।
सर्वाभीष्टप्रदां पुंसां ब्रवीम्यखिलकामदम् ।। १२।।
दुर्गादेवी समाख्याता हिमवानृषिरुच्यते ।
छन्दोनुष्टुप् जपो देव्याः प्रीतये क्रियते सदा ।। १३।।
ऋषिच्छन्दांसि – अस्य श्रीदुर्गास्तोत्रमहामन्त्रस्य । हिमवान् ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । दुर्गाभगवती देवता । श्रीदुर्गाप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
श्रीभगवत्यै दुर्गायै नमः ।
देवीध्यानम्
ॐ ह्रीं कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखांशङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम् ।
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं
ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः ।।
श्री जयदुर्गायै नमः ।
ॐ शिवाऽथोमा रमा शक्तिरनन्ता निष्कलाऽमला ।
शान्ता माहेश्वरी नित्या शाश्वता परमा क्षमा ।। १।।
अचिन्त्या केवलानन्ता शिवात्मा परमात्मिका ।
अनादिरव्यया शुद्धा सर्वज्ञा सर्वगाऽचला ।। २।।
एकानेकविभागस्था मायातीता सुनिर्मला ।
महामाहेश्वरी सत्या महादेवी निरञ्जना ।। ३।।
काष्ठा सर्वान्तरस्थाऽपि चिच्छक्तिश्चात्रिलालिता ।
सर्वा सर्वात्मिका विश्वा ज्योतीरूपाऽक्षराऽमृता ।। ४।।
शान्ता प्रतिष्ठा सर्वेशा निवृत्तिरमृतप्रदा ।
व्योममूर्तिर्व्योमसंस्था व्योमधाराऽच्युताऽतुला ।। ५।।
अनादिनिधनाऽमोघा कारणात्मकलाकुला ।
ऋतुप्रथमजाऽनाभिरमृतात्मसमाश्रया ।। ६।।
प्राणेश्वरप्रिया नम्या महामहिषघातिनी ।
प्राणेश्वरी प्राणरूपा प्रधानपुरुषेश्वरी ।। ७।।
सर्वशक्तिकलाऽकामा महिषेष्टविनाशिनी ।
सर्वकार्यनियन्त्री च सर्वभूतेश्वरेश्वरी ।। ८।।
अङ्गदादिधरा चैव तथा मुकुटधारिणी ।
सनातनी महानन्दाऽऽकाशयोनिस्तथेच्यते ।। ९।।
चित्प्रकाशस्वरूपा च महायोगेश्वरेश्वरी ।
महामाया सदुष्पारा मूलप्रकृतिरीशिका ।। १०।।
संसारयोनिः सकला सर्वशक्तिसमुद्भवा ।
संसारपारा दुर्वारा दुर्निरीक्षा दुरासदा ।। ११।।
प्राणशक्तिश्च सेव्या च योगिनी परमाकला ।
महाविभूतिर्दुर्दर्शा मूलप्रकृतिसम्भवा ।। १२।।
अनाद्यनन्तविभवा परार्था पुरुषारणिः ।
सर्गस्थित्यन्तकृच्चैव सुदुर्वाच्या दुरत्यया ।। १३।।
शब्दगम्या शब्दमाया शब्दाख्यानन्दविग्रहा ।
प्रधानपुरुषातीता प्रधानपुरुषात्मिका ।। १४।।
पुराणी चिन्मया पुंसामिष्टदा पुष्टिरूपिणी ।
पूतान्तरस्था कूटस्था महापुरुषसंज्ञिता ।। १५।।
जन्ममृत्युजरातीता सर्वशक्तिस्वरूपिणी ।
वाञ्छाप्रदाऽनवच्छिन्नप्रधानानुप्रवेशिनी ।। १६।।
क्षेत्रज्ञाऽचिन्त्यशक्तिस्तु प्रोच्यतेऽव्यक्तलक्षणा ।
मलापवर्जिताऽऽनादिमाया त्रितयतत्त्विका ।। १७।।
प्रीतिश्च प्रकृतिश्चैव गुहावासा तथोच्यते ।
महामाया नगोत्पन्ना तामसी च ध्रुवा तथा ।। १८।।
व्यक्ताऽव्यक्तात्मिका कृष्णा रक्ता शुक्ला ह्यकारणा ।
प्रोच्यते कार्यजननी नित्यप्रसवधर्मिणी ।। १९।।
सर्गप्रलयमुक्ता च सृष्टिस्थित्यन्तधर्मिणी ।
ब्रह्मगर्भा चतुर्विंशस्वरूपा पद्मवासिनी ।। २०।।
अच्युताह्लादिका विद्युद्ब्रह्मयोनिर्महालया ।
महालक्ष्मी समुद्भावभावितात्मामहेश्वरी ।। २१।।
महाविमानमध्यस्था महानिद्रा सकौतुका ।
सर्वार्थधारिणी सूक्ष्मा ह्यविद्धा परमार्थदा ।। २२।।
अनन्तरूपाऽनन्तार्था तथा पुरुषमोहिनी ।
अनेकानेकहस्ता च कालत्रयविवर्जिता ।। २३।।
ब्रह्मजन्मा हरप्रीता मतिर्ब्रह्मशिवात्मिका ।
ब्रह्मेशविष्णुसम्पूज्या ब्रह्माख्या ब्रह्मसंज्ञिता ।। २४।।
व्यक्ता प्रथमजा ब्राह्मी महारात्रीः प्रकीर्तिता ।
ज्ञानस्वरूपा वैराग्यरूपा ह्यैश्वर्यरूपिणी ।। २५।।
धर्मात्मिका ब्रह्ममूर्तिः प्रतिश्रुतपुमर्थिका ।
अपांयोनिः स्वयम्भूता मानसी तत्त्वसम्भवा ।। २६।।
ईश्वरस्य प्रिया प्रोक्ता शङ्करार्धशरीरिणी ।
भवानी चैव रुद्राणी महालक्ष्मीस्तथाऽम्बिका ।। २७।।
महेश्वरसमुत्पन्ना भुक्तिमुक्ति प्रदायिनी ।
सर्वेश्वरी सर्ववन्द्या नित्यमुक्ता सुमानसा ।। २८।।
महेन्द्रोपेन्द्रनमिता शाङ्करीशानुवर्तिनी ।
ईश्वरार्धासनगता माहेश्वरपतिव्रता ।। २९।।
संसारशोषिणी चैव पार्वती हिमवत्सुता ।
परमानन्ददात्री च गुणाग्र्या योगदा तथा ।। ३०।।
ज्ञानमूर्तिश्च सावित्री लक्ष्मीः श्रीः कमला तथा ।
अनन्तगुणगम्भीरा ह्युरोनीलमणिप्रभा ।। ३१।।
सरोजनिलया गङ्गा योगिध्येयाऽसुरार्दिनी ।
सरस्वती सर्वविद्या जगज्ज्येष्ठा सुमङ्गला ।। ३२।।
वाग्देवी वरदा वर्या कीर्तिः सर्वार्थसाधिका ।
वागीश्वरी ब्रह्मविद्या महाविद्या सुशोभना ।। ३३।।
ग्राह्यविद्या वेदविद्या धर्मविद्याऽऽत्मभाविता ।
स्वाहा विश्वम्भरा सिद्धिः साध्या मेधा धृतिः कृतिः ।। ३४।।
सुनीतिः संकृतिश्चैव कीर्तिता नरवाहिनी ।
पूजाविभाविनी सौम्या भोग्यभाग् भोगदायिनी ।। ३५।।
शोभावती शाङ्करी च लोला मालाविभूषिता ।
परमेष्ठिप्रिया चैव त्रिलोकीसुन्दरी माता ।। ३६।।
नन्दा सन्ध्या कामधात्री महादेवी सुसात्त्विका ।
महामहिषदर्पघ्नी पद्ममालाऽघहारिणी ।। ३७।।
विचित्रमुकुटा रामा कामदाता प्रकीर्तिता ।
पिताम्बरधरा दिव्यविभूषण विभूषिता ।। ३८।।
दिव्याख्या सोमवदना जगत्संसृष्टिवर्जिता ।
निर्यन्त्रा यन्त्रवाहस्था नन्दिनी रुद्रकालिका ।। ३९।।
आदित्यवर्णा कौमारी मयूरवरवाहिनी ।
पद्मासनगता गौरी महाकाली सुरार्चिता ।। ४०।।
अदितिर्नियता रौद्री पद्मगर्भा विवाहना ।
विरूपाक्षा केशिवाहा गुहापुरनिवासिनी ।। ४१।।
महाफलाऽनवद्याङ्गी कामरूपा सरिद्वरा ।
भास्वद्रूपा मुक्तिदात्री प्रणतक्लेशभञ्जना ।। ४२।।
कौशिकी गोमिनी रात्रिस्त्रिदशारिविनाशिनी ।
बहुरूपा सुरूपा च विरूपा रूपवर्जिता ।। ४३।।
भक्तार्तिशमना भव्या भवभावविनाशिनी ।
सर्वज्ञानपरीताङ्गी सर्वासुरविमर्दिका ।। ४४।।
पिकस्वनी सामगीता भवाङ्कनिलया प्रिया ।
दीक्षा विद्याधरी दीप्ता महेन्द्राहितपातिनी ।। ४५।।
सर्वदेवमया दक्षा समुद्रान्तरवासिनी ।
अकलङ्का निराधारा नित्यसिद्धा निरामया ।। ४६।।
कामधेनुबृहद्गर्भा धीमती मौननाशिनी ।
निःसङ्कल्पा निरातङ्का विनया विनयप्रदा ।। ४७।।
ज्वालामाला सहस्राढ्या देवदेवी मनोमया ।
सुभगा सुविशुद्धा च वसुदेवसमुद्भवा ।। ४८।।
महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी भक्तिगम्या परावरा ।
ज्ञानज्ञेया परातीता वेदान्तविषया मतिः ।। ४९।।
दक्षिणा दाहिका दह्या सर्वभूतहृदिस्थिता ।
योगमाया विभागज्ञा महामोहा गरीयसी ।। ५०।।
सन्ध्या सर्वसमुद्भूता ब्रह्मवृक्षाश्रियाऽदितिः ।
बीजाङ्कुरसमुद्भूता महाशक्तिर्महामतिः ।। ५१।।
ख्यातिः प्रज्ञावती संज्ञा महाभोगीन्द्रशायिनी ।
हींकृतिः शङ्करी शान्तिर्गन्धर्वगणसेविता ।। ५२।।
वैश्वानरी महाशूला देवसेना भवप्रिया ।
महारात्री परानन्दा शची दुःस्वप्ननाशिनी ।। ५३।।
ईड्या जया जगद्धात्री दुर्विज्ञेया सुरूपिणी ।
गुहाम्बिका गणोत्पन्ना महापीठा मरुत्सुता ।। ५४।।
हव्यवाहा भवानन्दा जगद्योनिः प्रकीर्तिता ।
जगन्माता जगन्मृत्युर्जरातीता च बुद्धिदा ।। ५५।।
सिद्धिदात्री रत्नगर्भा रत्नगर्भाश्रया परा ।
दैत्यहन्त्री स्वेष्टदात्री मङ्गलैकसुविग्रहा ।। ५६।।
पुरुषान्तर्गता चैव समाधिस्था तपस्विनी ।
दिविस्थिता त्रिणेत्रा च सर्वेन्द्रियमनाधृतिः ।। ५७।।
सर्वभूतहृदिस्था च तथा संसारतारिणी ।
वेद्या ब्रह्मविवेद्या च महालीला प्रकीर्तिता ।। ५८।।
ब्राह्मणिबृहती ब्राह्मी ब्रह्मभूताऽघहारिणी ।
हिरण्मयी महादात्री संसारपरिवर्तिका ।। ५९।।
सुमालिनी सुरूपा च भास्विनी धारिणी तथा ।
उन्मूलिनी सर्वसभा सर्वप्रत्ययसाक्षिणी ।। ६०।।
सुसौम्या चन्द्रवदना ताण्डवासक्तमानसा ।
सत्त्वशुद्धिकरी शुद्धा मलत्रयविनाशिनी ।। ६१।।
जगत्त्त्रयी जगन्मूर्तिस्त्रिमूर्तिरमृताश्रया ।
विमानस्था विशोका च शोकनाशिन्यनाहता ।। ६२।।
हेमकुण्डलिनी काली पद्मवासा सनातनी ।
सदाकीर्तिः सर्वभूतशया देवी सतांप्रिया ।। ६३।।
ब्रह्ममूर्तिकला चैव कृत्तिका कञ्जमालिनी ।
व्योमकेशा क्रियाशक्तिरिच्छाशक्तिः परागतिः ।। ६४।।
क्षोभिका खण्डिकाभेद्या भेदाभेदविवर्जिता ।
अभिन्ना भिन्नसंस्थाना वशिनी वंशधारिणी ।। ६५।।
गुह्यशक्तिर्गुह्यतत्त्वा सर्वदा सर्वतोमुखी ।
भगिनी च निराधारा निराहारा प्रकीर्तिता ।। ६६।।
निरङ्कुशपदोद्भूता चक्रहस्ता विशोधिका ।
स्रग्विणी पद्मसम्भेदकारिणी परिकीर्तिता ।। ६७।।
परावरविधानज्ञा महापुरुषपूर्वजा ।
परावरज्ञा विद्या च विद्युज्जिह्वा जिताश्रया ।। ६८।।
विद्यामयी सहस्राक्षी सहस्रवदनात्मजा ।
सहस्ररश्मिःसत्वस्था महेश्वरपदाश्रया ।। ६९।।
ज्वालिनी सन्मया व्याप्ता चिन्मया पद्मभेदिका ।
महाश्रया महामन्त्रा महादेवमनोरमा ।। ७०।।
व्योमलक्ष्मीः सिंहरथा चेकितानाऽमितप्रभा ।
विश्वेश्वरी भगवती सकला कालहारिणी ।। ७१।।
सर्ववेद्या सर्वभद्रा गुह्या दूढा गुहारणी ।
प्रलया योगधात्री च गङ्गा विश्वेश्वरी तथा ।। ७२।।
कामदा कनका कान्ता कञ्जगर्भप्रभा तथा ।
पुण्यदा कालकेशा च भोक्त्त्री पुष्करिणी तथा ।। ७३।।
सुरेश्वरी भूतिदात्री भूतिभूषा प्रकीर्तिता ।
पञ्चब्रह्मसमुत्पन्ना परमार्थाऽर्थविग्रहा ।। ७४।।
वर्णोदया भानुमूर्तिर्वाग्विज्ञेया मनोजवा ।
मनोहरा महोरस्का तामसी वेदरूपिणी ।। ७५।।
वेदशक्तिर्वेदमाता वेदविद्याप्रकाशिनी ।
योगेश्वरेश्वरी माया महाशक्तिर्महामयी ।। ७६।।
विश्वान्तःस्था वियन्मूर्तिर्भार्गवी सुरसुन्दरी ।
सुरभिर्नन्दिनी विद्या नन्दगोपतनूद्भवा ।। ७७।।
भारती परमानन्दा परावरविभेदिका ।
सर्वप्रहरणोपेता काम्या कामेश्वरेश्वरी ।। ७८।।
अनन्तानन्दविभवा हृल्लेखा कनकप्रभा ।
कूष्माण्डा धनरत्नाढ्या सुगन्धा गन्धदायिनी ।। ७९।।
त्रिविक्रमपदोद्भूता चतुरास्या शिवोदया ।
सुदुर्लभा धनाध्यक्षा धन्या पिङ्गललोचना ।। ८०।।
शान्ता प्रभास्वरूपा च पङ्कजायतलोचना ।
इन्द्राक्षी हृदयान्तःस्था शिवा माता च सत्क्रिया ।। ८१।।
गिरिजा च सुगूढा च नित्यपुष्टा निरन्तरा ।
दुर्गा कात्यायनी चण्डी चन्द्रिका कान्तविग्रहा ।। ८२।।
हिरण्यवर्णा जगती जगद्यन्त्रप्रवर्तिका ।
मन्दराद्रिनिवासा च शारदा स्वर्णमालिनी ।। ८३।।
रत्नमाला रत्नगर्भा व्युष्टिर्विश्वप्रमाथिनी ।
पद्मानन्दा पद्मनिभा नित्यपुष्टा कृतोद्भवा ।। ८४।।
नारायणी दुष्टशिक्षा सूर्यमाता वृषप्रिया ।
महेन्द्रभगिनी सत्या सत्यभाषा सुकोमला ।। ८५।।
वामा च पञ्चतपसां वरदात्री प्रकीर्तिता ।
वाच्यवर्णेश्वरी विद्या दुर्जया दुरतिक्रमा ।। ८६।।
कालरात्रिर्महावेगा वीरभद्रप्रिया हिता ।
भद्रकाली जगन्माता भक्तानां भद्रदायिनी ।। ८७।।
कराला पिङ्गलाकारा कामभेत्त्री महामनाः ।
यशस्विनी यशोदा च षडध्वपरिवर्तिका ।। ८८।।
शङ्खिनी पद्मिनी संख्या सांख्ययोगप्रवर्तिका ।
चैत्रादिर्वत्सरारूढा जगत्सम्पूरणीन्द्रजा ।। ८९।।
शुम्भघ्नी खेचराराध्या कम्बुग्रीवा बलीडिता ।
खगारूढा महैश्वर्या सुपद्मनिलया तथा ।। ९०।।
विरक्ता गरुडस्था च जगतीहृद्गुहाश्रया ।
शुम्भादिमथना भक्तहृद्गह्वरनिवासिनी ।। ९१।।
जगत्त्त्रयारणी सिद्धसङ्कल्पा कामदा तथा ।
सर्वविज्ञानदात्री चानल्पकल्मषहारिणी ।। ९२।।
सकलोपनिषद्गम्या दुष्टदुष्प्रेक्ष्यसत्तमा ।
सद्वृता लोकसंव्याप्ता तुष्टिः पुष्टिः क्रियावती ।। ९३।।
विश्वामरेश्वरी चैव भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ।
शिवाधृता लोहिताक्षी सर्पमालाविभूषणा ।। ९४।।
निरानन्दा त्रिशूलासिधनुर्बाणादिधारिणी ।
अशेषध्येयमूर्तिश्च देवतानां च देवता ।। ९५।।
वराम्बिका गिरेः पुत्री निशुम्भविनिपातिनी ।
सुवर्णा स्वर्णलसिताऽनन्तवर्णा सदाधृता ।। ९६।।
शाङ्करी शान्तहृदया अहोरात्रविधायिका ।
विश्वगोप्त्री गूढरूपा गुणपूर्णा च गार्ग्यजा ।। ९७।।
गौरी शाकम्भरी सत्यसन्धा सन्ध्यात्रयीधृता ।
सर्वपापविनिर्मुक्ता सर्वबन्धविवर्जिता ।। ९८।।
सांख्ययोगसमाख्याता अप्रमेया मुनीडिता ।
विशुद्धसुकुलोद्भूता बिन्दुनादसमादृता ।। ९९।।
शम्भुवामाङ्कगा चैव शशितुल्यनिभानना ।
वनमालाविराजन्ती अनन्तशयनादृता ।। १००।।
नरनारायणोद्भूता नारसिंही प्रकीर्तिता ।
दैत्यप्रमाथिनी शङ्खचक्रपद्मगदाधरा ।। १०१।।
सङ्कर्षणसमुत्पन्ना अम्बिका सज्जनाश्रया ।
सुवृता सुन्दरी चैव धर्मकामार्थदायिनी ।। १०२।।
मोक्षदा भक्तिनिलया पुराणपुरुषादृता ।
महाविभूतिदाऽऽराध्या सरोजनिलयाऽसमा ।। १०३।।
अष्टादशभुजाऽनादिर्नीलोत्पलदलाक्षिणी ।
सर्वशक्तिसमारूढा धर्माधर्मविवर्जिता ।। १०४।।
वैराग्यज्ञाननिरता निरालोका निरिन्द्रिया ।
विचित्रगहनाधारा शाश्वतस्थानवासिनी ।। १०५।।
ज्ञानेश्वरी पीतचेला वेदवेदाङ्गपारगा ।
मनस्विनी मन्युमाता महामन्युसमुद्भवा ।। १०६।।
अमन्युरमृतास्वादा पुरन्दरपरिष्टुता ।
अशोच्या भिन्नविषया हिरण्यरजतप्रिया ।। १०७।।
हिरण्यजननी भीमा हेमाभरणभूषिता ।
विभ्राजमाना दुर्ज्ञेया ज्योतिष्टोमफलप्रदा ।। १०८।।
महानिद्रासमुत्पत्तिरनिद्रा सत्यदेवता ।
दीर्घा ककुद्मिनी पिङ्गजटाधारा मनोज्ञधीः ।। १०९।।
महाश्रया रमोत्पन्ना तमःपारे प्रतिष्ठिता ।
त्रितत्त्वमाता त्रिविधा सुसूक्ष्मा पद्मसंश्रया ।। ११०।।
शान्त्यतीतकलाऽतीतविकारा श्वेतचेलिका ।
चित्रमाया शिवज्ञानस्वरूपा दैत्यमाथिनी ।। १११।।
काश्यपी कालसर्पाभवेणिका शास्त्रयोनिका ।
त्रयीमूर्तिः क्रियामूर्तिश्चतुर्वर्गा च दर्शिनी ।। ११२।।
नारायणी नरोत्पन्ना कौमुदी कान्तिधारिणी ।
कौशिकी ललिता लीला परावरविभाविनी ।। ११३।।
वरेण्याऽद्भुतमहात्म्या वडवा वामलोचना ।
सुभद्रा चेतनाराध्या शान्तिदा शान्तिवर्धिनी ।। ११४।।
जयादिशक्तिजननी शक्तिचक्रप्रवर्तिका ।
त्रिशक्तिजननी जन्या षट्सूत्रपरिवर्णिता ।। ११५।।
सुधौतकर्मणाऽऽराध्या युगान्तदहनात्मिका ।
सङ्कर्षिणी जगद्धात्री कामयोनिः किरीटिनी ।। ११६।।
ऐन्द्री त्रैलोक्यनमिता वैष्णवी परमेश्वरी ।
प्रद्युम्नजननी बिम्बसमोष्ठी पद्मलोचना ।। ११७।।
मदोत्कटा हंसगतिः प्रचण्डा चण्डविक्रमा ।
वृषाधीशा परात्मा च विन्ध्या पर्वतवासिनी ।। ११८।।
हिमवन्मेरुनिलया कैलासपुरवासिनी ।
चाणूरहन्त्री नीतिज्ञा कामरूपा त्रयीतनुः ।। ११९।।
व्रतस्नाता धर्मशीला सिंहासननिवासिनी ।
वीरभद्रादृता वीरा महाकालसमुद्भवा ।। १२०।।
विद्याधरार्चिता सिद्धसाध्याराधितपादुका ।
श्रद्धात्मिका पावनी च मोहिनी अचलात्मिका ।। १२१।।
महाद्भुता वारिजाक्षी सिंहवाहनगामिनी ।
मनीषिणी सुधावाणी वीणावादनतत्परा ।। १२२।।
श्वेतवाहनिषेव्या च लसन्मतिररुन्धती ।
हिरण्याक्षी तथा चैव महानन्दप्रदायिनी ।। १२३।।
वसुप्रभा सुमाल्याप्तकन्धरा पङ्कजानना ।
परावरा वरारोहा सहस्रनयनार्चिता ।। १२४।।
श्रीरूपा श्रीमती श्रेष्ठा शिवनाम्नी शिवप्रिया ।
श्रीप्रदा श्रितकल्याणा श्रीधरार्धशरीरिणी ।। १२५।।
श्रीकलाऽनन्तदृष्टिश्च ह्यक्षुद्राऽऽरातिसूदनी ।
रक्तबीजनिहन्त्री च दैत्यसङ्गविमर्दिनी ।। १२६।।
सिंहारूढा सिंहिकास्या दैत्यशोणितपायिनी ।
सुकीर्तिसहिताच्छिन्नसंशया रसवेदिनी ।। १२७।।
गुणाभिरामा नागारिवाहना निर्जरार्चिता ।
नित्योदिता स्वयंज्योतिः स्वर्णकाया प्रकीर्तिता ।। १२८।।
वज्रदण्डाङ्किता चैव तथाऽमृतसञ्जीविनी ।
वज्रच्छन्ना देवदेवी वरवज्रस्वविग्रहा ।। १२९।।
माङ्गल्या मङ्गलात्मा च मालिनी माल्यधारिणी ।
गन्धर्वी तरुणी चान्द्री खड्गायुधधरा तथा ।। १३०।।
सौदामिनी प्रजानन्दा तथा प्रोक्ता भृगूद्भवा ।
एकानङ्गा च शास्त्रार्थकुशला धर्मचारिणी ।। १३१।।
धर्मसर्वस्ववाहा च धर्माधर्मविनिश्चया ।
धर्मशक्तिर्धर्ममया धार्मिकानां शिवप्रदा ।। १३२।।
विधर्मा विश्वधर्मज्ञा धर्मार्थान्तरविग्रहा ।
धर्मवर्ष्मा धर्मपूर्वा धर्मपारङ्गतान्तरा ।। १३३।।
धर्मोपदेष्ट्री धर्मात्मा धर्मगम्या धराधरा ।
कपालिनी शाकलिनी कलाकलितविग्रहा ।। १३४।।
सर्वशक्तिविमुक्ता च कर्णिकारधराऽक्षरा।
कंसप्राणहरा चैव युगधर्मधरा तथा ।। १३५।।
युगप्रवर्तिका प्रोक्ता त्रिसन्ध्या ध्येयविग्रहा ।
स्वर्गापवर्गदात्री च तथा प्रत्यक्षदेवता ।। १३६।।
आदित्या दिव्यगन्धा च दिवाकरनिभप्रभा ।
पद्मासनगता प्रोक्ता खड्गबाणशरासना ।। १३७।।
शिष्टा विशिष्टा शिष्टेष्टा शिष्टश्रेष्ठप्रपूजिता ।
शतरूपा शतावर्ता वितता रासमोदिनी ।। १३८।।
सूर्येन्दुनेत्रा प्रद्युम्नजननी सुष्ठुमायिनी ।
सूर्यान्तरस्थिता चैव सत्प्रतिष्ठतविग्रहा ।। १३९।।
निवृत्ता प्रोच्यते ज्ञानपारगा पर्वतात्मजा ।
कात्यायनी चण्डिका च चण्डी हैमवती तथा ।। १४०।।
दाक्षायणी सती चैव भवानी सर्वमङ्गला ।
धूम्रलोचनहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ।। १४१।।
योगनिद्रा योगभद्रा समुद्रतनया तथा ।
देवप्रियङ्करी शुद्धा भक्तभक्तिप्रवर्धिनी ।। १४२।।
त्रिणेत्रा चन्द्रमुकुटा प्रमथार्चितपादुका ।
अर्जुनाभीष्टदात्री च पाण्डवप्रियकारिणी ।। १४३।।
कुमारलालनासक्ता हरबाहूपधानिका ।
विघ्नेशजननी भक्तविघ्नस्तोमप्रहारिणी ।। १४४।।
सुस्मितेन्दुमुखी नम्या जयाप्रियसखी तथा ।
अनादिनिधना प्रेष्ठा चित्रमाल्यानुलेपना ।। १४५।।
कोटिचन्द्रप्रतीकाशा कूटजालप्रमाथिनी ।
कृत्याप्रहारिणी चैव मारणोच्चाटनी तथा ।। १४६।।
सुरासुरप्रवन्द्याङ्घ्रिर्मोहघ्नी ज्ञानदायिनी ।
षड्वैरिनिग्रहकरी वैरिविद्राविणी तथा ।। १४७।।
भूतसेव्या भूतदात्री भूतपीडाविमर्दिका ।
नारदस्तुतचारित्रा वरदेशा वरप्रदा ।। १४८।।
वामदेवस्तुता चैव कामदा सोमशेखरा ।
दिक्पालसेविता भव्या भामिनी भावदायिनी ।। १४९।।
स्त्रीसौभाग्यप्रदात्री च भोगदा रोगनाशिनी ।
व्योमगा भूमिगा चैव मुनिपूज्यपदाम्बुजा ।
वनदुर्गा च दुर्बोधा महादुर्गा प्रकीर्तिता ।। १५०।।
फलश्रुतिः
इतीदं कीर्तिदं भद्र दुर्गानामसहस्रकम् ।त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं तस्य लक्ष्मीः स्थिरा भवेत् ।। १।।
ग्रहभूतपिशाचादिपीडा नश्यत्यसंशयम् ।
बालग्रहादिपीडायाः शान्तिर्भवति कीर्तनात् ।। २।।
मारिकादिमहारोगे पठतां सौख्यदं नृणाम् ।
व्यवहारे च जयदं शत्रुबाधानिवारकम् ।। ३।।
दम्पत्योः कलहे प्राप्ते मिथः प्रेमाभिवर्धकम् ।
आयुरारोग्यदं पुंसां सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।। ४।।
विद्याभिवर्धकं नित्यं पठतामर्थसाधकम् ।
शुभदं शुभकार्येषु पठतां शृणुतामपि ।। ५।।
यः पूजयति दुर्गां तां दुर्गानामसहस्रकैः ।
पुष्पैः कुङ्कुमसम्मिश्रैः स तु यत्काङ्क्षते हृदि ।। ६।।
तत्सर्वं समवाप्नोति नास्ति नास्त्यत्र संशयः ।
यन्मुखे ध्रियते नित्यं दुर्गानामसहस्रकम् ।। ७।।
किं तस्येतरमन्त्रौघैः कार्यं धन्यतमस्य हि ।
दुर्गानामसहस्रस्य पुस्तकं यद्गृहे भवेत् ।। ८।।
न तत्र ग्रहभूतादिबाधा स्यान्मङ्गलास्पदे ।
तद्गृहं पुण्यदं क्षेत्रं देवीसान्निध्यकारकम् ।। ९।।
एतस्य स्तोत्रमुख्यस्य पाठकः श्रेष्ठमन्त्रवित् ।
देवतायाः प्रसादेन सर्वपूज्यः सुखी भवेत् ।। १०।।
इत्येतन्नगराजेन कीर्तितं मुनिसत्तम ।
गुह्याद्गुह्यतरं स्तोत्रं त्वयि स्नेहात् प्रकीर्तितम् ।। ११।।
भक्ताय श्रद्धधानाय केवलं कीर्त्यतामिदम् ।
हृदि धारय नित्यं त्वं देव्यनुग्रहसाधकम् ।। १२।। ।।
इति श्रीस्कान्दपुराणे स्कन्दनारदसंवादे दुर्गासहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
|| शनैश्चरस्तवराजः ||
|| शनैश्चरस्तवराजः ||
नारद उवाच
ध्यात्वा गणपतिं राजा धर्मराजो युधिष्ठिरः |
धीरः शनैश्चरस्येमं चकार स्तवमुत्तमम || १||
शिरो में भास्करिः पातु भालं छायासुतोऽवतु |
कोटराक्षो दृशौ पातु शिखिकण्ठनिभः श्रुती || २||
घ्राणं मे भीषणः पातु मुखं बलिमुखोऽवतु |
स्कन्धौ संवर्तकः पातु भुजौ मे भयदोऽवतु || ३||
सौरिर्मे हृदयं पातु नाभिं शनैश्चरोऽवतु |
ग्रहराजः कटिं पातु सर्वतो रविनन्दनः || ४||
पादौ मन्दगतिः पातु कृष्णः पात्वखिलं वपुः |
रक्षामेतां पठेन्नित्यं सौरेर्नामबलैर्युताम् || ५||
सुखी पुत्री चिरायुश्च स भवेन्नात्र संशयः |
सौरिः शनैश्चरः कृष्णो नीलोत्पलनिभः शनिः || ६||
शुष्कोदरो विशालाक्षो र्दुनिरीक्ष्यो विभीषणः |
शिखिकण्ठनिभो नीलश्छायाहृदयनन्दनः || ७||
कालदृष्टिः कोटराक्षः स्थूलरोमावलीमुखः |
दीर्घो निर्मांसगात्रस्तु शुष्को घोरो भयानकः || ८||
नीलांशुः क्रोधनो रौद्रो दीर्घश्मश्रुर्जटाधरः |
मन्दो मन्दगतिः खंजो तृप्तः संवर्तको यमः || ९||
ग्रहराजः कराली च सूर्यपुत्रो रविः शशी |
कुजो बुधो गुरूः काव्यो भानुजः सिंहिकासुतः || १०||
केतुर्देवपतिर्बाहुः कृतान्तो नैऋतस्तथा |
शशी मरूत्कुबेरश्च ईशानः सुर आत्मभूः || ११||
विष्णुर्हरो गणपतिः कुमारः काम ईश्वरः |
कर्ता हर्ता पालयिता राज्यभुग् राज्यदायकः || १२||
छायासुतः श्यामलाङ्गो धनहर्ता धनप्रदः |
क्रूरकर्मविधाता च सर्वकर्मावरोधकः || १३||
तुष्टो रूष्टः कामरूपः कामदो रविनन्दनः |
ग्रहपीडाहरः शान्तो नक्षत्रेशो ग्रहेश्वरः || १४||
स्थिरासनः स्थिरगतिर्महाकायो महाबलः |
महाप्रभो महाकालः कालात्मा कालकालकः || १५||
आदित्यभयदाता च मृत्युरादित्यनंदनः |
शतभिद्रुक्षदयिता त्रयोदशितिथिप्रियः || १६||
तिथ्यात्मा तिथिगणनो नक्षत्रगणनायकः |
योगराशिर्मुहूर्तात्मा कर्ता दिनपतिः प्रभुः || १७||
शमीपुष्पप्रियः श्यामस्त्रैलोक्याभयदायकः |
नीलवासाः क्रियासिन्धुर्नीलाञ्जनचयच्छविः || १८||
सर्वरोगहरो देवः सिद्धो देवगणस्तुतः |
अष्टोत्तरशतं नाम्नां सौरेश्छायासुतस्य यः || १९||
पठेन्नित्यं तस्य पीडा समस्ता नश्यति ध्रुवम् |
कृत्वा पूजां पठेन्मर्त्यो भक्तिमान्यः स्तवं सदा || २०||
विशेषतः शनिदिने पीडा तस्य विनश्यति |
जन्मलग्ने स्थितिर्वापि गोचरे क्रूरराशिगे || २१||
दशासु च गते सौरे तदा स्तवमिमं पठेत् |
पूजयेद्यः शनिं भक्त्या शमीपुष्पाक्षताम्बरैः || २२||
विधाय लोहप्रतिमां नरो दुःखाद्विमुच्यते |
वाधा याऽन्यग्रहाणां च यः पठेत्तस्य नश्यति || २३||
भीतो भयाद्विमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात् |
रोगी रोगाद्विमुच्येत नरः स्तवमिमं पठेत् || २४||
पुत्रवान्धनवान् श्रीमान् जायते नात्र संशयः || २५||
नारद उवाच ||
स्तवं निशम्य पार्थस्य प्रत्यक्षोऽभूच्छनैश्चरः |
दत्त्वा राज्ञे वरः कामं शनिश्चान्तर्दधे तदा || २६||
|| इति श्री भविष्यपुराणे शनैश्चरस्तवराजः सम्पूर्णः ||
॥ शनैश्चरस्तोत्रम् ॥
॥ श्रीशनैश्चरस्तोत्रम् ॥
अस्य श्रीशनैश्चरस्तोत्रस्य दशरथ ऋषिः । शनैश्चरो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । । शनैश्चरप्रीत्यर्थ जपे विनियोगः।
दशरथ उवाच –
कोणोऽण्तको रौद्रयमोऽथ बभ्रुः कृष्णः शनिः पिंगलमन्दोसौरिः ।
नित्यं स्मृतो यो हरते च पीडां तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ १॥
सुरासुराः किंपुरुषोरगेन्द्रा गन्धर्वविद्याधरपन्नगाश्च ।
पीड्यन्ति सर्वे विषमश्थितेन तस्मैइ नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ २॥
नरा नरेन्द्राः पशवो मृगेन्द्रा वन्याश्च ये कीटपतंगभृङ्गाः ।
पीड्यन्ति सर्वे विषमश्थितेन तस्मैइ नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ३॥
देशाश्च दुर्गाणि वनाणि यत्र सेनानिवेशाः पुरपत्तनानि ।
पीड्यन्ति सर्वे विषमश्थितेन तस्मैइ नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ४॥
तिलैर्यवैर्माषगुडान्नदानैर्लोहेन नीलाम्बरदानतो वा ।
प्रीणाति मन्त्रैर्निजवसरे च तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ५॥
प्रयागकूले यमुनातटे च सरस्वतीपुण्यजले गुहायाम् ।
यो योगिनां ध्यानगतोऽपि सूक्ष्मस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ६॥
अन्यप्रदेशात्स्वगृहं प्रविष्टस्तदीयवारे स नरः सुखी स्यत् ।
गृहाद् गतो यो न पुनः प्रयाति तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ७॥
स्रष्टा स्वयंभूर्भुवनत्रयस्य त्राता हरीशो हरते पिनाकी ।
एकस्त्रिधाअ ऋग्ययजुःसाममूर्तिस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ८॥
शन्यष्टकं यः प्रयतः प्रभते नित्यं सुपुत्रैः पशुबान्धवैश्च ।
पठेत्तु सौख्यं भुवि भोगयुक्तः प्राप्नोति निर्वाणपदं तदन्ते ॥ ९॥
कोणस्थः पिङ्गलो बभ्रुः कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः ।
सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः ॥ १०॥
एतानि दश नामाअनि प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
शनैश्चरकृता पीडा न कदाचिद्भविष्यति ॥ ११॥
॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे श्रीशनैश्चरस्तोत्रं संपूर्णम् ॥
श्री अङ्गारकाष्टोत्तर शतनामावलि
॥ श्री अङ्गारकाष्टोत्तर शतनामावलि ॥
ॐ महीसुताय नमः ॥ॐ महाभागाय नमः ॥
ॐ मङ्गळाय नमः ॥
ॐ मङ्गलप्रदाय नमः ॥
ॐ महावीराय नमः ॥
ॐ महाशूराय नमः ॥
ॐ महाबलपराक्रमाय नमः ॥
ॐ महारौद्राय नमः ॥
ॐ महाभद्राय नमः ॥
ॐ माननीयाय नमः || १०||
ॐ दयाकराय नमः ॥
ॐ मानदाय नमः ॥
ॐ अमर्षणाय नमः ॥
ॐ क्रूराय नमः ॥
ॐ तापपापविवर्जिताय नमः ॥
ॐ सुप्रतीकाय नमः ॥
ॐ सुताम्राक्षाय नमः ॥
ॐ सुब्रह्मण्याय नमः ॥
ॐ सुखप्रदाय नमः ॥
ॐ वक्रस्तंभादिगमनाय नमः || २०||
ॐ वरेण्याय नमः ॥
ॐ वरदाय नमः ॥
ॐ सुखिने नमः ॥
ॐ वीरभद्राय नमः ॥
ॐ विरूपाक्षाय नमः ॥
ॐ विदूरस्थाय नमः ॥
ॐ विभावसवे नमः ॥
ॐ नक्षत्रचक्र संचारिणे नमः ॥
ॐ नक्षत्ररूपाय नमः ॥
ॐ क्षात्रवर्जिताय नमः || ३०||
ॐ क्षयवृद्धिविनिर्मुक्ताय नमः ॥
ॐ विचक्षणाय नमः ॥
ॐ अक्षीणफलदाय नमः ॥
ॐ चक्षुर्गोचराय नमः ॥
ॐ शुभलक्षणाय नमः ॥
ॐ वीतरागाय नमः ॥
ॐ वीतभयाय नमः ॥
ॐ विज्वराय नमः ॥
ॐ विश्वकारणाय नमः ॥
ॐ नक्षत्रराशि संचाराय नमः || ४०||
ॐ नानाभय निकृंतनाय नमः ॥
ॐ कमनीयाय नमः ॥
ॐ दयासाराय नमः ॥
ॐ कनत्कनकभूषणाय नमः ॥
ॐ भयघ्नाय नमः ॥
ॐ भव्यफलदाय नमः ॥
ॐ भक्ताभयवरप्रदाय नमः ॥
ॐ शत्रुहंत्रे नमः ॥
ॐ शमोपेताय नमः ॥
ॐ शरणागत पोषकाय नमः || ५०||
ॐ साहसाय नमः ॥
ॐ सद्गुणाध्यक्षाय नमः ॥
ॐ साधवे नमः ॥
ॐ समरदुर्जयाय नमः ॥
ॐ दुष्टदूराय नमः ॥
ॐ शिष्टपूज्याय नमः ॥
ॐ सर्वकष्टनिवारकाय नमः ॥
ॐ दुश्चेष्टावारकाय नमः ॥
ॐ दुःखभंजनाय नमः ॥
ॐ दुर्धराय नमः || ६०||
ॐ हरये नमः ॥
ॐ दुस्स्वप्नहंत्रे नमः ॥
ॐ दुर्धर्षाय नमः ॥
ॐ दुष्टगर्वविमोचकाय नमः ॥
ॐ भरद्वाजकुलोद्भवाय नमः ॥
ॐ भूसुताय नमः ॥
ॐ भव्यभूषणाय नमः ॥
ॐरक्तांबराय नमः ॥
ॐरक्तववुषे नमः ॥
ॐ भक्तपालनतत्पराय नमः || ७०||
ॐ चतुर्भुजाय नमः ॥
ॐ गदाधारिणे नमः ॥
ॐ मेषवाहनाय नमः ॥
ॐ मिताशनाय नमः ॥
ॐ शक्तिशूलधराय नमः ॥
ॐ शक्ताय नमः ॥
ॐ शस्त्रविद्याविशारदाय नमः ॥
ॐ तार्किकाय नमः ॥
ॐ तामसाधाराय नमः ॥
ॐ तपस्विने नमः || ८०||
ॐ ताम्रलोचनाय नमः ॥
ॐ तप्तकांचनसंकाशाय नमः ॥
ॐ रक्तकिंजल्कसन्निभाय नमः ॥
ॐ गोत्राधिदेवताय नमः ॥
ॐ गोमध्यचराय नमः ॥
ॐ गुणविभूषणाय नमः ॥
ॐ असृजे नमः ॥
ॐ अङ्गारकाय नमः ॥
ॐ अवंतीदेशाधीशाय नमः ॥
ॐ जनार्दनाय नमः || ९०||
ॐ सूर्ययाम्य प्रदेशस्थाय नमः ॥
ॐ यौवनाय नमः ॥
ॐ याम्यदिङ्मुखाय नमः ॥
ॐ त्रिकोणमंडलगताय नमः ॥
ॐ त्रिदशाधिपसन्नुताय नमः ॥
ॐ शुचये नमः ॥
ॐ शुचिकराय नमः ॥
ॐ शूराय नमः ॥
ॐ शुचिवश्याय नमः ॥
ॐ शुभावहाय नमः || १००||
ॐ मेषवृश्चिकराशीशाय नमः ॥
ॐ मेधाविने नमः ॥
ॐ मितभाषिणे नमः ॥
ॐ सुखप्रदाय नमः ॥
ॐ सुरूपाक्षाय नमः ॥
ॐ सर्वाभीष्टफलप्रदाय नमः ॥
ॐ श्रीमते अङ्गारकाय नमः ॥
॥इति अङ्गारक अष्टोत्तर शतनामावलि ॥
||चन्द्र अष्टोत्तरशतनामावलिः ||
||चन्द्र अष्टोत्तरशतनामावलिः ||
चन्द्र बीज मन्त्र -ॐ श्राँ श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः ||
ॐ श्रीमते नमः ||
ॐ शशधराय नमः ||
ॐ चन्द्राय नमः ||
ॐ ताराधीशाय नमः ||
ॐ निशाकराय नमः ||
ॐ सुखनिधये नमः ||
ॐ सदाराध्याय नमः ||
ॐ सत्पतये नमः ||
ॐ साधुपूजिताय नमः ||
ॐ जितेन्द्रियाय नमः ||
ॐ जयोद्योगाय नमः ||
ॐ ज्योतिश्चक्रप्रवर्तकाय नमः ||
ॐ विकर्तनानुजाय नमः ||
ॐ वीराय नमः ||
ॐ विश्वेशाय नमः ||
ॐ विदुशां पतये नमः ||
ॐ दोषकराय नमः ||
ॐ दुष्टदूराय नमः ||
ॐ पुष्टिमते नमः ||
ॐ शिष्टपालकाय नमः ||
ॐ अष्टमूर्तिप्रियाय नमः ||
ॐ अनन्ताय नमः ||
ॐ कष्टदारुकुठरकाय नमः ||
ॐ स्वप्रकाशाय नमः ||
ॐ प्रकाशात्मने नमः ||
ॐ द्युचराय नमः ||
ॐ देवभोजनाय नमः ||
ॐ कलाधराय नमः ||
ॐ कालहेतवे नमः ||
ॐ कामकृते नमः ||
ॐ कामदायकाय नमः ||
ॐ मृत्युसंहारकाय नमः ||
ॐ अमर्त्याय नमः ||
ॐ नित्यानुष्ठानदायकाय नमः ||
ॐ क्षपाकराय नमः ||
ॐ क्षीणपापाय नमः ||
ॐ क्षयवृद्धिसमन्विताय नमः ||
ॐ जैवातृकाय नमः ||
ॐ शुचये नमः ||
ॐ शुभ्राय नमः ||
ॐ जयिने नमः ||
ॐ जयफलप्रदाय नमः ||
ॐ सुधामयाय नमः ||
ॐ सुरस्वामिने नमः ||
ॐ भक्तनामिष्टदायकाय नमः ||
ॐ भुक्तिदाय नमः ||
ॐ मुक्तिदाय नमः ||
ॐ भद्राय नमः ||
ॐ भक्तदारिद्र्यभञ्जनाय नमः ||
ॐ सामगानप्रियाय नमः ||
ॐ सर्वरक्षकाय नमः ||
ॐ सागरोद्भवाय नमः ||
ॐ भयान्तकृते नमः ||
ॐ भक्तिगम्याय नमः ||
ॐ भवबन्धविमोचकाय नमः ||
ॐ जगत्प्रकाशकिरणाय नमः ||
ॐ जगदानन्दकारणाय नमः ||
ॐ निस्सपत्नाय नमः ||
ॐ निराहाराय नमः ||
ॐ निर्विकाराय नमः ||
ॐ निरामयाय नमः ||
ॐ भूच्छयाच्छादिताय नमः ||
ॐ भव्याय नमः ||
ॐ भुवनप्रतिपालकाय नमः ||
ॐ सकलार्तिहराय नमः ||
ॐ सौम्यजनकाय नमः ||
ॐ साधुवन्दिताय नमः ||
ॐ सर्वागमज्ञाय नमः ||
ॐ सर्वज्ञाय नमः ||
ॐ सनकादिमुनिस्तुताय नमः ||
ॐ सितच्छत्रध्वजोपेताय नमः ||
ॐ सिताङ्गाय नमः ||
ॐ सितभूषनाय नमः ||
ॐ श्वेतमाल्याम्बरधराय नमः ||
ॐ श्वेतगन्धानुलेपनाय नमः ||
ॐ दशाश्वरथसंरूढाय नमः ||
ॐ दण्डपानये नमः ||
ॐ धनुर्धराय नमः ||
ॐ कुन्दपुष्पोज्ज्वलाकाराय नमः ||
ॐ नयनाब्जसमुद्भवाय नमः ||
ॐ आत्रेयगोत्रजाय नमः ||
ॐ अत्यन्तविनयाय नमः ||
ॐ प्रियदायकाय नमः ||
ॐ करुणारससंपूर्णाय नमः ||
ॐ कर्कटप्रभवे नमः ||
ॐ अव्ययाय नमः ||
ॐ चतुरश्रासनारूढाय नमः ||
ॐ चतुराय नमः ||
ॐ दिव्यवाहनाय नमः ||
ॐ विवस्वन्मण्डलज्ञेयवसाय नमः ||
ॐ वसुसमृद्धिदाय नमः ||
ॐ महेश्वरप्रियाय नमः ||
ॐ दान्ताय नमः ||
ॐ मेरुगोत्रप्रदक्षिणाय नमः ||
ॐ ग्रहमण्डलमध्यस्थाय नमः ||
ॐ ग्रसितार्काय नमः ||
ॐ ग्रहाधिपाय नमः ||
ॐ द्विजराजाय नमः ||
ॐ द्युतिकलाय नमः ||
ॐ द्विभुजाय नमः ||
ॐ द्विजपूजिताय नमः ||
ॐ औदुम्बरनगावासाय नमः ||
ॐ उदाराय नमः ||
ॐ रोहिणीपतये नमः ||
ॐ नित्योदयाय नमः ||
ॐ मुनिस्तुत्याय नमः ||
ॐ नित्यानन्दफलप्रदाय नमः ||
ॐ सकलाह्लादनकराय नमः ||
ॐ पलाशेध्मप्रियाय नमः ||
||इति चन्द्र अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णम् ||
||बुध अष्टोत्तरशतनामवलिः ||
||बुध अष्टोत्तरशतनामवलिः ||
बुध बीज मन्त्र -ॐ ब्राँ ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः ||
ॐ बुधाय नमः ||
ॐ बुधार्चिताय नमः ||
ॐ सौम्याय नमः ||
ॐ सौम्यचित्ताय नमः ||
ॐ शुभप्रदाय नमः ||
ॐ दृढव्रताय नमः ||
ॐ दृढफलाय नमः ||
ॐ श्रुतिजालप्रबोधकाय नमः ||
ॐ सत्यवासाय नमः ||
ॐ सत्यवचसे नमः ||१०
ॐ श्रेयसां पतये नमः ||
ॐ अव्ययाय नमः ||
ॐ सोमजाय नमः ||
ॐ सुखदाय नमः ||
ॐ श्रीमते नमः ||
ॐ सोमवंशप्रदीपकाय नमः ||
ॐ वेदविदे नमः ||
ॐ वेदतत्त्वाशाय नमः ||
ॐ वेदान्तज्ञानभास्कराय नमः ||
ॐ विद्याविचक्षणाय नमः ||२०
ॐ विदुषे नमः ||
ॐ विद्वत्प्रीतिकराय नमः ||
ॐ ऋजवे नमः ||
ॐ विश्वानुकूलसंचाराय नमः ||
ॐ विशेषविनयान्विताय नमः ||
ॐ विविधागमसारज्ञाय नमः ||
ॐ वीर्यवते नमः ||
ॐ विगतज्वराय नमः ||
ॐ त्रिवर्गफलदाय नमः ||
ॐ अनन्ताय नमः ||३०
ॐ त्रिदशाधिपपूजिताय नमः ||
ॐ बुद्धिमते नमः ||
ॐ बहुशास्त्रज्ञाय नमः ||
ॐ बलिने नमः ||
ॐ बन्धविमोचकाय नमः ||
ॐ वक्रातिवक्रगमनाय नमः ||
ॐ वासवाय नमः ||
ॐ वसुधाधिपाय नमः ||
ॐ प्रसन्नवदनाय नमः ||
ॐ वन्द्याय नमः ||४०
ॐ वरेण्याय नमः ||
ॐ वाग्विलक्षणाय नमः ||
ॐ सत्यवते नमः ||
ॐ सत्यसंकल्पाय नमः ||
ॐ सत्यबन्धवे नमः ||
ॐ सदादराय नमः ||
ॐ सर्वरोगप्रशमनाय नमः ||
ॐ सर्वमृत्युनिवारकाय नमः ||
ॐ वाणिज्यनिपुणाय नमः ||
ॐ वश्याय नमः ||५०
ॐ वाताङ्गाय नमः ||
ॐ वातरोगहृते नमः ||
ॐ स्थूलाय नमः ||
ॐ स्थैर्यगुणाध्यक्षाय नमः ||
ॐ स्थूलसूक्ष्मादिकारणाय नमः ||
ॐ अप्रकाशाय नमः ||
ॐ प्रकाशात्मने नमः ||
ॐ घनाय नमः ||
ॐ गगनभूषणाय नमः ||
ॐ विधिस्तुत्याय नमः ||६०
ॐ विशालाक्षाय नमः ||
ॐ विद्वज्जनमनोहराय नमः ||
ॐ चारुशीलाय नमः ||
ॐ स्वप्रकाशाय नमः ||
ॐ चपलाय नमः ||
ॐ जितेन्द्रियाय नमः ||
ॐ उदङ्मुखाय नमः ||
ॐ मखासक्ताय नमः ||
ॐ मगधाधिपतये नमः ||
ॐ हरये नमः ||७०
ॐ सौम्यवत्सरसंजाताय नमः ||
ॐ सोमप्रियकराय नमः ||
ॐ महते नमः ||
ॐ सिंहाधिरूढाय नमः ||
ॐ सर्वज्ञाय नमः ||
ॐ शिखिवर्णाय नमः ||
ॐ शिवंकराय नमः ||
ॐ पीताम्बराय नमः ||
ॐ पीतवपुषे नमः ||
ॐ पीतच्छत्रध्वजाङ्किताय नमः ||८०
ॐ खड्गचर्मधराय नमः ||
ॐ कार्यकर्त्रे नमः ||
ॐ कलुषहारकाय नमः ||
ॐ आत्रेयगोत्रजाय नमः ||
ॐ अत्यन्तविनयाय नमः ||
ॐ विश्वपवनाय नमः ||
ॐ चाम्पेयपुष्पसंकाशाय नमः ||
ॐ चारणाय नमः ||
ॐ चारुभूषणाय नमः ||
ॐ वीतरागाय नमः ||९०
ॐ वीतभयाय नमः ||
ॐ विशुद्धकनकप्रभाय नमः ||
ॐ बन्धुप्रियाय नमः ||
ॐ बन्धुयुक्ताय नमः ||
ॐ वनमण्डलसंश्रिताय नमः ||
ॐ अर्केशाननिवासस्थाय नमः ||
ॐ तर्कशास्त्रविशारदाय नमः ||
ॐ प्रशान्ताय नमः ||
ॐ प्रीतिसंयुक्ताय नमः ||
ॐ प्रियकृते नमः ||१००
ॐ प्रियभूषणाय नमः ||
ॐ मेधाविने नमः ||
ॐ माधवसक्ताय नमः ||
ॐ मिथुनाधिपतये नमः ||
ॐ सुधिये नमः ||
ॐ कन्याराशिप्रियाय नमः ||
ॐ कामप्रदाय नमः ||
ॐ घनफलाश्रयाय नमः ||
||इति बुध अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णम् ||
शुक्र अष्टोत्तरशतनामावलिः
||शुक्र अष्टोत्तरशतनामावलिः ||
शुक्र बीज मन्त्र - ॐ द्राँ द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः ||
ॐ शुक्राय नमः ||
ॐ शुचये नमः ||
ॐ शुभगुणाय नमः ||
ॐ शुभदाय नमः ||
ॐ शुभलक्षणाय नमः ||
ॐ शोभनाक्षाय नमः ||
ॐ शुभ्रवाहाय नमः ||
ॐ शुद्धस्फटिकभास्वराय नमः ||
ॐ दीनार्तिहरकाय नमः ||
ॐ दैत्यगुरवे नमः ||१०
ॐ देवाभिवन्दिताय नमः ||
ॐ काव्यासक्ताय नमः ||
ॐ कामपालाय नमः ||
ॐ कवये नमः ||
ॐ कल्याणदायकाय नमः ||
ॐ भद्रमूर्तये नमः ||
ॐ भद्रगुणाय नमः ||
ॐ भार्गवाय नमः ||
ॐ भक्तपालनाय नमः ||
ॐ भोगदाय नमः ||२०
ॐ भुवनाध्यक्षाय नमः ||
ॐ भुक्तिमुक्तिफलप्रदाय नमः ||
ॐ चारुशीलाय नमः ||
ॐ चारुरूपाय नमः ||
ॐ चारुचन्द्रनिभाननाय नमः ||
ॐ निधये नमः ||
ॐ निखिलशास्त्रज्ञाय नमः ||
ॐ नीतिविद्याधुरंधराय नमः ||
ॐ सर्वलक्षणसंपन्नाय नमः ||
ॐ सर्वापद्गुणवर्जिताय नमः ||३०
ॐ समानाधिकनिर्मुक्ताय नमः ||
ॐ सकलागमपारगाय नमः ||
ॐ भृगवे नमः ||
ॐ भोगकराय नमः ||
ॐ भूमिसुरपालनतत्पराय नमः ||
ॐ मनस्विने नमः ||
ॐ मानदाय नमः ||
ॐ मान्याय नमः ||
ॐ मायातीताय नमः ||
ॐ महायशसे नमः ||४०
ॐ बलिप्रसन्नाय नमः ||
ॐ अभयदाय नमः ||
ॐ बलिने नमः ||
ॐ सत्यपराक्रमाय नमः ||
ॐ भवपाशपरित्यागाय नमः ||
ॐ बलिबन्धविमोचकाय नमः ||
ॐ घनाशयाय नमः ||
ॐ घनाध्यक्षाय नमः ||
ॐ कम्बुग्रीवाय नमः ||
ॐ कलाधराय नमः ||५०
ॐ कारुण्यरससंपूर्णाय नमः ||
ॐ कल्याणगुणवर्धनाय नमः ||
ॐ श्वेताम्बराय नमः ||
ॐ श्वेतवपुषे नमः ||
ॐ चतुर्भुजसमन्विताय नमः ||
ॐ अक्षमालाधराय नमः ||
ॐ अचिन्त्याय नमः ||
ॐ अक्षीणगुणभासुराय नमः ||
ॐ नक्षत्रगणसंचाराय नमः ||
ॐ नयदाय नमः ||६०
ॐ नीतिमार्गदाय नमः ||
ॐ वर्षप्रदाय नमः ||
ॐ हृषीकेशाय नमः ||
ॐ क्लेशनाशकराय नमः ||
ॐ कवये नमः ||
ॐ चिन्तितार्थप्रदाय नमः ||
ॐ शान्तमतये नमः ||
ॐ चित्तसमाधिकृते नमः ||
ॐ आधिव्याधिहराय नमः ||
ॐ भूरिविक्रमाय नमः ||७०
ॐ पुण्यदायकाय नमः ||
ॐ पुराणपुरुषाय नमः ||
ॐ पूज्याय नमः ||
ॐ पुरुहूतादिसन्नुताय नमः ||
ॐ अजेयाय नमः ||
ॐ विजितारातये नमः ||
ॐ विविधाभरणोज्ज्वलाय नमः ||
ॐ कुन्दपुष्पप्रतीकाशाय नमः ||
ॐ मन्दहासाय नमः ||
ॐ महामतये नमः ||८०
ॐ मुक्ताफलसमानाभाय नमः ||
ॐ मुक्तिदाय नमः ||
ॐ मुनिसन्नुताय नमः ||
ॐ रत्नसिंहासनारूढाय नमः ||
ॐ रथस्थाय नमः ||
ॐ रजतप्रभाय नमः ||
ॐ सूर्यप्राग्देशसंचाराय नमः ||
ॐ सुरशत्रुसुहृदे नमः ||
ॐ कवये नमः ||
ॐ तुलावृषभराशीशाय नमः ||९०
ॐ दुर्धराय नमः ||
ॐ धर्मपालकाय नमः ||
ॐ भाग्यदाय नमः ||
ॐ भव्यचारित्राय नमः ||
ॐ भवपाशविमोचकाय नमः ||
ॐ गौडदेशेश्वराय नमः ||
ॐ गोप्त्रे नमः ||
ॐ गुणिने नमः ||
ॐ गुणविभूषणाय नमः ||
ॐ ज्येष्ठानक्षत्रसंभूताय नमः ||१००
ॐ ज्येष्ठाय नमः ||
ॐ श्रेष्ठाय नमः ||
ॐ शुचिस्मिताय नमः ||
ॐ अपवर्गप्रदाय नमः ||
ॐ अनन्ताय नमः ||
ॐ सन्तानफलदायकाय नमः ||
ॐ सर्वैश्वर्यप्रदाय नमः ||
ॐ सर्वगीर्वाणगणसन्नुताय नमः ||
||इति शुक्र अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णम् ||
राहु अष्टोत्तरशतनामावलिः
||राहु अष्टोत्तरशतनामावलिः ||
राहु बीज मन्त्र - ॐ भ्राँ भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः ||
ॐ राहवे नमः ||
ॐ सैंहिकेयाय नमः ||
ॐ विधुन्तुदाय नमः ||
ॐ सुरशत्रवे नमः ||
ॐ तमसे नमः ||
ॐ फणिने नमः ||
ॐ गार्ग्यनयाय नमः ||
ॐ सुरापिने नमः ||
ॐ नीलजीमूतसंकाशाय नमः ||
ॐ चतुर्भुजाय नमः ||१०
ॐ खङ्गखेटकधारिणे नमः ||
ॐ वरदायकहस्तकाय नमः ||
ॐ शूलायुधाय नमः ||
ॐ मेघवर्णाय नमः ||
ॐ कृष्णध्वजपताकावते नमः ||
ॐ दक्षिणाशामुखरथाय नमः ||
ॐ तीक्ष्णदंष्ट्रकरालकाय नमः ||
ॐ शूर्पाकारसंस्थाय नमः ||
ॐ गोमेदाभरणप्रियाय नमः ||
ॐ माषप्रियाय नमः ||२०
ॐ कश्यपर्षिनन्दनाय नमः ||
ॐ भुजगेश्वराय नमः ||
ॐ उल्कापातयित्रे नमः ||
ॐ शूलिने नमः ||
ॐ निधिपाय नमः ||
ॐ कृष्णसर्पराजे नमः ||
ॐ विषज्वलावृतास्याय अर्धशरीराय नमः ||
ॐ शात्रवप्रदाय नमः ||
ॐ रवीन्दुभीकराय नमः ||
ॐ छायास्वरूपिणे नमः ||३०
ॐ कठिनाङ्गकाय नमः ||
ॐ द्विषच्चक्रच्छेदकाय नमः ||
ॐ करालास्याय नमः ||
ॐ भयंकराय नमः ||
ॐ क्रूरकर्मणे नमः ||
ॐ तमोरूपाय नमः ||
ॐ श्यामात्मने नमः ||
ॐ नीललोहिताय नमः ||
ॐ किरीटिणे नमः ||
ॐ नीलवसनाय नमः ||४०
ॐ शनिसमान्तवर्त्मगाय नमः ||
ॐ चाण्डालवर्णाय नमः ||
ॐ अश्व्यर्क्षभवाय नमः ||
ॐ मेषभवाय नमः ||
ॐ शनिवत्फलदाय नमः ||
ॐ शूराय नमः ||
ॐ अपसव्यगतये नमः ||
ॐ उपरागकराय नमः ||
ॐ सोमसूर्यच्छविविमर्दकाय नमः ||
ॐ नीलपुष्पविहाराय नमः ||५०
ॐ ग्रहश्रेष्ठाय नमः ||
ॐ अष्टमग्रहाय नमः ||
ॐ कबन्धमात्रदेहाय नमः ||
ॐ यातुधानकुलोद्भवाय नमः ||
ॐ गोविन्दवरपात्राय नमः ||
ॐ देवजातिप्रविष्टकाय नमः ||
ॐ क्रूराय नमः ||
ॐ घोराय नमः ||
ॐ शनेर्मित्राय नमः ||
ॐ शुक्रमित्राय नमः ||६०
ॐ अगोचराय नमः ||
ॐ माने गङ्गास्नानदात्रे नमः ||
ॐ स्वगृहे प्रबलाढ्यदाय नमः ||
ॐ सद्गृहेऽन्यबलधृते नमः ||
ॐ चतुर्थे मातृनाशकाय नमः ||
ॐ चन्द्रयुक्ते चण्डालजन्मसूचकाय नमः ||
ॐ सिंहजन्मने नमः ||
ॐ राज्यदात्रे नमः ||
ॐ महाकायाय नमः ||
ॐ जन्मकर्त्रे नमः ||७०
ॐ विधुरिपवे नमः ||
ॐ मादकज्ञानदाय नमः ||
ॐ जन्मकन्याराज्यदात्रे नमः ||
ॐ जन्महानिदाय नमः ||
ॐ नवमे पितृहन्त्रे नमः ||
ॐ पञ्चमे शोकदायकाय नमः ||
ॐ द्यूने कलत्रहन्त्रे नमः ||
ॐ सप्तमे कलहप्रदाय नमः ||
ॐ षष्ठे वित्तदात्रे नमः ||
ॐ चतुर्थे वैरदायकाय नमः ||८०
ॐ नवमे पापदात्रे नमः ||
ॐ दशमे शोकदायकाय नमः ||
ॐ आदौ यशः प्रदात्रे नमः ||
ॐ अन्ते वैरप्रदायकाय नमः ||
ॐ कालात्मने नमः ||
ॐ गोचराचाराय नमः ||
ॐ धने ककुत्प्रदाय नमः ||
ॐ पञ्चमे धिशणाशृङ्गदाय नमः ||
ॐ स्वर्भानवे नमः ||
ॐ बलिने नमः ||९०
ॐ महासौख्यप्रदायिने नमः ||
ॐ चन्द्रवैरिणे नमः ||
ॐ शाश्वताय नमः ||
ॐ सुरशत्रवे नमः ||
ॐ पापग्रहाय नमः ||
ॐ शाम्भवाय नमः ||
ॐ पूज्यकाय नमः ||
ॐ पाटीरपूरणाय नमः ||
ॐ पैठीनसकुलोद्भवाय नमः ||
ॐ भक्तरक्षाय नमः ||१००
ॐ राहुमूर्तये नमः ||
ॐ सर्वाभीष्टफलप्रदाय नमः ||
ॐ दीर्घाय नमः ||
ॐ कृष्णाय नमः ||
ॐ अतनवे नमः ||
ॐ विष्णुनेत्रारये नमः ||
ॐ देवाय नमः ||
ॐ दानवाय नमः ||
||इति राहु अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णम् ||
केतु अष्टोत्तरशतनामावलिः
|| केतु अष्टोत्तरशतनामावलिः ||
केतु बीज मन्त्र -
ॐ स्राँ स्रीं स्रौं सः केतवे नमः ||ॐ केतवे नमः ||
ॐ स्थूलशिरसे नमः ||
ॐ शिरोमात्राय नमः ||
ॐ ध्वजाकृतये नमः ||
ॐ नवग्रहयुताय नमः ||
ॐ सिंहिकासुरीगर्भसंभवाय नमः ||
ॐ महाभीतिकराय नमः ||
ॐ चित्रवर्णाय नमः ||
ॐ श्रीपिङ्गलाक्षकाय नमः ||
ॐ फुल्लधूम्रसंकाषाय नमः ||१०
ॐ तीक्ष्णदंष्ट्राय नमः ||
ॐ महोदराय नमः ||
ॐ रक्तनेत्राय नमः ||
ॐ चित्रकारिणे नमः ||
ॐ तीव्रकोपाय नमः ||
ॐ महासुराय नमः ||
ॐ क्रूरकण्ठाय नमः ||
ॐ क्रोधनिधये नमः ||
ॐ छायाग्रहविशेषकाय नमः ||
ॐ अन्त्यग्रहाय नमः ||२०
ॐ महाशीर्षाय नमः ||
ॐ सूर्यारये नमः ||
ॐ पुष्पवद्ग्राहिणे नमः ||
ॐ वरहस्ताय नमः ||
ॐ गदापाणये नमः ||
ॐ चित्रवस्त्रधराय नमः ||
ॐ चित्रध्वजपताकाय नमः ||
ॐ घोराय नमः ||
ॐ चित्ररथाय नमः ||
ॐ शिखिने नमः ||३०
ॐ कुलुत्थभक्षकाय नमः ||
ॐ वैडूर्याभरणाय नमः ||
ॐ उत्पातजनकाय नमः ||
ॐ शुक्रमित्राय नमः ||
ॐ मन्दसखाय नमः ||
ॐ गदाधराय नमः ||
ॐ नाकपतये नमः ||
ॐ अन्तर्वेदीश्वराय नमः ||
ॐ जैमिनिगोत्रजाय नमः ||
ॐ चित्रगुप्तात्मने नमः ||४०
ॐ दक्षिणामुखाय नमः ||
ॐ मुकुन्दवरपात्राय नमः ||
ॐ महासुरकुलोद्भवाय नमः ||
ॐ घनवर्णाय नमः ||
ॐ लम्बदेवाय नमः ||
ॐ मृत्युपुत्राय नमः ||
ॐ उत्पातरूपधारिणे नमः ||
ॐ अदृश्याय नमः ||
ॐ कालाग्निसंनिभाय नमः ||
ॐ नृपीडाय नमः ||५०
ॐ ग्रहकारिणे नमः ||
ॐ सर्वोपद्रवकारकाय नमः ||
ॐ चित्रप्रसूताय नमः ||
ॐ अनलाय नमः ||
ॐ सर्वव्याधिविनाशकाय नमः ||
ॐ अपसव्यप्रचारिणे नमः ||
ॐ नवमे पापदायकाय नमः ||
ॐ पंचमे शोकदाय नमः ||
ॐ उपरागखेचराय नमः ||
ॐ अतिपुरुषकर्मणे नमः ||६०
ॐ तुरीये सुखप्रदाय नमः ||
ॐ तृतीये वैरदाय नमः ||
ॐ पापग्रहाय नमः ||
ॐ स्फोटककारकाय नमः ||
ॐ प्राणनाथाय नमः ||
ॐ पञ्चमे श्रमकारकाय नमः ||
ॐ द्वितीयेऽस्फुटवग्दात्रे नमः ||
ॐ विषाकुलितवक्त्रकाय नमः ||
ॐ कामरूपिणे नमः ||
ॐ सिंहदन्ताय नमः ||७०
ॐ कुशेध्मप्रियाय नमः ||
ॐ चतुर्थे मातृनाशाय नमः ||
ॐ नवमे पितृनाशकाय नमः ||
ॐ अन्त्ये वैरप्रदाय नमः ||
ॐ सुतानन्दन्निधनकाय नमः ||
ॐ सर्पाक्षिजाताय नमः ||
ॐ अनङ्गाय नमः ||
ॐ कर्मराश्युद्भवाय नमः ||
ॐ उपान्ते कीर्तिदाय नमः ||
ॐ सप्तमे कलहप्रदाय नमः ||८०
ॐ अष्टमे व्याधिकर्त्रे नमः ||
ॐ धने बहुसुखप्रदाय नमः ||
ॐ जनने रोगदाय नमः ||
ॐ ऊर्ध्वमूर्धजाय नमः ||
ॐ ग्रहनायकाय नमः ||
ॐ पापदृष्टये नमः ||
ॐ खेचराय नमः ||
ॐ शाम्भवाय नमः ||
ॐ अशेषपूजिताय नमः ||
ॐ शाश्वताय नमः ||९०
ॐ नटाय नमः ||
ॐ शुभाशुभफलप्रदाय नमः ||
ॐ धूम्राय नमः ||
ॐ सुधापायिने नमः ||
ॐ अजिताय नमः ||
ॐ भक्तवत्सलाय नमः ||
ॐ सिंहासनाय नमः ||
ॐ केतुमूर्तये नमः ||
ॐ रवीन्दुद्युतिनाशकाय नमः ||
ॐ अमराय नमः ||१००
ॐ पीडकाय नमः ||
ॐ अमर्त्याय नमः ||
ॐ विष्णुदृष्टाय नमः ||
ॐ असुरेश्वराय नमः ||
ॐ भक्तरक्षाय नमः ||
ॐ वैचित्र्यकपटस्यन्दनाय नमः ||
ॐ विचित्रफलदायिने नमः ||
ॐ भक्ताभीष्टफलप्रदाय नमः ||
||इति केतु अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णम् ||
द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग स्तोत्रम्
|| द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग स्तोत्रम् ||
सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम् |
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये || १||
श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम् |
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम् || २||
अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् |
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम् || ३||
कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय |
सदैवमान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे || ४||
पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् |
सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि || ५||
याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः |
सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये || ६||
महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः |
सुरासुरैर्यक्ष महोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे || ७||
सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरितीरपवित्रदेशे |
यद्धर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे || ८||
सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः |
श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि || ९||
यं डाकिनिशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च |
सदैव भीमादिपदप्रसिद्दं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि || १०||
सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् |
वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये || ११||
इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम् |
वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणम् प्रपद्ये || १२||
ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण |
स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ||
|| इति द्वादश ज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रं संपूर्णम् ||
चन्द्रशेखराष्टकं
॥ अथ चन्द्रशेखराष्टकम् ॥
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहिमाम् ।
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ १॥
रत्नसानुशरासनं रजतादिशृङ्गनिकेतनं
सिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युताननसायकम् ।
क्षिप्रदघपुरत्रयं त्रिदिवालयैभिवन्दितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ २॥
पञ्चपादपपुष्पगन्धपदाम्बुजदूयशोभितं
भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रह।म् ।
भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशनं भवमव्ययं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ३॥
मत्त्वारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीमनोहरं
पङ्कजासनपद्मलोचनपुजिताङ्घ्रिसरोरुहम् ।
देवसिन्धुतरङ्गसीकर सिक्तशुभ्रजटाधरं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ४॥
यक्षराजसखं भगाक्षहरं भुजङ्गविभूषणं
शैलराजसुता परिष्कृत चारुवामकलेवरम् ।
क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ५॥
कुण्डलीकृतकुण्डलेश्वरकुण्डलं वृषवाहनं
नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम् ।
अन्धकान्धकामा श्रिता मरपादपं शमनान्तकं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ६॥
भषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं
दक्षयज्ञर्विनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम् ।
भुक्तिमुक्तफलप्रदं सकलाघसङ्घनिवर्हनं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ७॥
भक्त वत्सलमचिञ्तं निधिमक्षयं हरिदम्वरं
सर्वभूतपतिं परात्पर प्रमेयमनुत्तमम् ।
सोमवारिज भूहुताशनसोमपानिलखाकृतिं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ८॥
विश्वसृष्टिविधालिनं पुनरेव पालनतत्परं
संहरन्तमपि प्रपञ्चम शेषलोकनिवासिनम् ।
क्रिडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथ समन्वितं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेकर चन्द्रशेकर रक्षमाम् ॥ ९॥
मृत्युभीतमृकण्डसूनुकृतस्तव शिव सन्निधौ
यत्र कुत्र च पठेन्नहि तस्य मृत्युभयं भवेत् ।
पूर्णमायुररोगितामखिलाथ सम्पदमादरं
चन्द्रशेखर एव तस्य ददाति मुक्तिमयत्नतः ॥ १०॥
॥ इति चन्द्रशेखराष्टकम् ॥
दारिद्र्य दहन शिवस्तोत्रं
|| दारिद्र्य दहन शिवस्तोत्रं ||
विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय कणामृताय शशिशेखरधारणाय |
कर्पूरकान्तिधवलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || १||
गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय |
गंगाधराय गजराजविमर्दनाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || २||
भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय |
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ३||
चर्मम्बराय शवभस्मविलेपनाय भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय |
मंझीरपादयुगलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ४||
पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय |
आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ५||
भानुप्रियाय भवसागरतारणाय कालान्तकाय कमलासनपूजिताय |
नेत्रत्रयाय शुभलक्षण लक्षिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ६||
रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय |
पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ७||
मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय |
मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ८||
वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणं |सर्वसंपत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम् |
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात् || ९||
|| इति श्रीवसिष्ठविरचितं दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ||
श्रीविश्वनाथाष्टकं
|| विश्वनाथाष्टकम् ||
गङ्गातरंगरमणीयजटाकलापं
गौरीनिरन्तरविभूषितवामभागम् |
नारायणप्रियमनंगमदापहारं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
वाचामगोचरमनेकगुणस्वरूपं
वागीशविष्णुसुरसेवितपादपीठम् |
वामेनविग्रहवरेणकलत्रवन्तं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
भूताधिपं भुजगभूषणभूषितांगं
व्याघ्राजिनांबरधरं जटिलं त्रिनेत्रम् |
पाशांकुशाभयवरप्रदशूलपाणिं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् |
शीतांशुशोभितकिरीटविराजमानं
भालेक्षणानलविशोषितपंचबाणम् |
नागाधिपारचितभासुरकर्णपूरं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
पंचाननं दुरितमत्तमतङ्गजानां
नागान्तकं दनुजपुंगवपन्नगानाम् |
दावानलं मरणशोकजराटवीनां
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
तेजोमयं सगुणनिर्गुणमद्वितीयं
आनन्दकन्दमपराजितमप्रमेयम् |
नागात्मकं सकलनिष्कलमात्मरूपं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
रागादिदोषरहितं स्वजनानुरागं
वैराग्यशान्तिनिलयं गिरिजासहायम् |
माधुर्यधैर्यसुभगं गरलाभिरामं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
आशां विहाय परिहृत्य परस्य निन्दां
पापे रतिं च सुनिवार्य मनः समाधौ |
आदाय हृत्कमलमध्यगतं परेशं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
वाराणसीपुरपतेः स्तवनं शिवस्य
व्याख्यातमष्टकमिदं पठते मनुष्यः |
विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं
सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम् ||
विश्वनाथाष्टकमिदं यः पठेच्छिवसन्निधौ |
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ||
|| इति श्रीमहर्षिव्यासप्रणीतं श्रीविश्वनाथाष्टकं संपूर्णम् ||
श्री वैद्यनाथाष्टकम्
|| वैद्यनाथाष्टकम्||
श्रीरामसौमित्रिजटायुवेद षडाननादित्य कुजार्चिताय |
श्रीनीलकण्ठाय दयामयाय श्रीवैद्यनाथाय नमःशिवाय || १||
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव |
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव ||
गङ्गाप्रवाहेन्दु जटाधराय त्रिलोचनाय स्मर कालहन्त्रे |
समस्त देवैरभिपूजिताय श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || २||
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव |
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव ||
भक्तःप्रियाय त्रिपुरान्तकाय पिनाकिने दुष्टहराय नित्यम् |
प्रत्यक्षलीलाय मनुष्यलोके श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || ३||
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव |
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव ||
प्रभूतवातादि समस्तरोग प्रनाशकर्त्रे मुनिवन्दिताय |
प्रभाकरेन्द्वग्नि विलोचनाय श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || ४||
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव |
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव ||
वाक् श्रोत्र नेत्राङ्घ्रि विहीनजन्तोः वाक्श्रोत्रनेत्रांघ्रिसुखप्रदाय |
कुष्ठादिसर्वोन्नतरोगहन्त्रे श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || ५||
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव |
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव ||
वेदान्तवेद्याय जगन्मयाय योगीश्वरद्येय पदाम्बुजाय |
त्रिमूर्तिरूपाय सहस्रनाम्ने श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || ६||
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव |
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव ||
स्वतीर्थमृद्भस्मभृताङ्गभाजां पिशाचदुःखार्तिभयापहाय |
आत्मस्वरूपाय शरीरभाजां श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || ७||
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव |
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव ||
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय स्रक्गन्ध भस्माद्यभिशोभिताय |
सुपुत्रदारादि सुभाग्यदाय श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || ८||
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव |
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव ||
वालाम्बिकेश वैद्येश भवरोगहरेति च |
जपेन्नामत्रयं नित्यं महारोगनिवारणम् || ९||
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव |
शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव ||
|| इति श्री वैद्यनाथाष्टकम् ||
शिवाष्टकं
॥ अथ श्री शिवाष्टकं ॥
प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं जगन्नाथनाथं सदानन्दभाजाम् ।
भवद्भव्यभूतेश्वरं भूतनाथं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ १॥
गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालं महाकालकालं गणेशाधिपालम् ।
जटाजूटभङ्गोत्तरङ्गैर्विशालं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ २॥
मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं महामण्डल भस्मभूषधरंतम् ।
अनादिह्यपारं महामोहहारं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ३॥
तटाधो निवासं महाट्टाट्टहासं महापापनाशं सदासुप्रकाशम् ।
गिरीशं गणेशं महेशं सुरेशं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ४॥
गिरिन्द्रात्मजासंग्रहीतार्धदेहं गिरौ संस्थितं सर्वदा सन्नगेहम् ।
परब्रह्मब्रह्मादिभिर्वन्ध्यमानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ५॥
कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं पदाम्भोजनम्राय कामं ददानम् ।
बलीवर्दयानं सुराणां प्रधानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ६॥
शरच्चन्द्रगात्रं गुणानन्द पात्रं त्रिनेत्रं पवित्रं धनेशस्य मित्रम् ।
अपर्णाकलत्रं चरित्रं विचित्रं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ७॥
हरं सर्पहारं चिता भूविहारं भवं वेदसारं सदा निर्विकारम् ।
श्मशाने वदन्तं मनोजं दहन्तं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ८॥
स्तवं यः प्रभाते नरः शूलपाणे पठेत् सर्वदा भर्गभावानुरक्तः ।
स पुत्रं धनं धान्यमित्रं कलत्रं विचित्रं समासाद्य मोक्षं प्रयाति ॥ ९॥
॥ इति शिवाष्टकम् ॥
गुरु अष्टोत्तरशतनामावलिः
||गुरु अष्टोत्तरशतनामावलिः ||
गुरु बीज मन्त्र - ॐ ग्राँ ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः ||
ॐ गुणाकराय नमः ||
ॐ गोप्त्रे नमः ||
ॐ गोचराय नमः ||
ॐ गोपतिप्रियाय नमः ||
ॐ गुणिने नमः ||
ॐ गुणवतां श्रेष्थाय नमः ||
ॐ गुरूणां गुरवे नमः ||
ॐ अव्ययाय नमः ||
ॐ जेत्रे नमः ||
ॐ जयन्ताय नमः ||
ॐ जयदाय नमः ||
ॐ जीवाय नमः ||
ॐ अनन्ताय नमः ||
ॐ जयावहाय नमः ||
ॐ आङ्गिरसाय नमः ||
ॐ अध्वरासक्ताय नमः ||
ॐ विविक्ताय नमः ||
ॐ अध्वरकृत्पराय नमः ||
ॐ वाचस्पतये नमः ||
ॐ वशिने नमः ||
ॐ वश्याय नमः ||
ॐ वरिष्ठाय नमः ||
ॐ वाग्विचक्षणाय नमः ||
ॐ चित्तशुद्धिकराय नमः ||
ॐ श्रीमते नमः ||
ॐ चैत्राय नमः ||
ॐ चित्रशिखण्डिजाय नमः ||
ॐ बृहद्रथाय नमः ||
ॐ बृहद्भानवे नमः ||
ॐ बृहस्पतये नमः ||
ॐ अभीष्टदाय नमः ||
ॐ सुराचार्याय नमः ||
ॐ सुराराध्याय नमः ||
ॐ सुरकार्यकृतोद्यमाय नमः ||
ॐ गीर्वाणपोषकाय नमः ||
ॐ धन्याय नमः ||
ॐ गीष्पतये नमः ||
ॐ गिरीशाय नमः ||
ॐ अनघाय नमः ||
ॐ धीवराय नमः ||
ॐ धिषणाय नमः ||
ॐ दिव्यभूषणाय नमः ||
ॐ देवपूजिताय नमः ||
ॐ धनुर्धराय नमः ||
ॐ दैत्यहन्त्रे नमः ||
ॐ दयासाराय नमः ||
ॐ दयाकराय नमः ||
ॐ दारिद्र्यनाशनाय नमः ||
ॐ धन्याय नमः ||
ॐ दक्षिणायनसंभवाय नमः ||
ॐ धनुर्मीनाधिपाय नमः ||
ॐ देवाय नमः ||
ॐ धनुर्बाणधराय नमः ||
ॐ हरये नमः ||
ॐ अङ्गिरोवर्षसंजताय नमः ||
ॐ अङ्गिरःकुलसंभवाय नमः ||
ॐ सिन्धुदेशाधिपाय नमः ||
ॐ धीमते नमः ||
ॐ स्वर्णकायाय नमः ||
ॐ चतुर्भुजाय नमः ||
ॐ हेमाङ्गदाय नमः ||
ॐ हेमवपुषे नमः ||
ॐ हेमभूषणभूषिताय नमः ||
ॐ पुष्यनाथाय नमः ||
ॐ पुष्यरागमणिमण्डलमण्डिताय नमः ||
ॐ काशपुष्पसमानाभाय नमः ||
ॐ इन्द्राद्यमरसंघपाय नमः ||
ॐ असमानबलाय नमः ||
ॐ सत्त्वगुणसंपद्विभावसवे नमः ||
ॐ भूसुराभीष्टदाय नमः ||
ॐ भूरियशसे नमः ||
ॐ पुण्यविवर्धनाय नमः ||
ॐ धर्मरूपाय नमः ||
ॐ धनाध्यक्षाय नमः ||
ॐ धनदाय नमः ||
ॐ धर्मपालनाय नमः ||
ॐ सर्ववेदार्थतत्त्वज्ञाय नमः ||
ॐ सर्वापद्विनिवारकाय नमः ||
ॐ सर्वपापप्रशमनाय नमः ||
ॐ स्वमतानुगतामराय नमः ||
ॐ ऋग्वेदपारगाय नमः ||
ॐ ऋक्षराशिमार्गप्रचारवते नमः ||
ॐ सदानन्दाय नमः ||
ॐ सत्यसंधाय नमः ||
ॐ सत्यसंकल्पमानसाय नमः ||
ॐ सर्वागमज्ञाय नमः ||
ॐ सर्वज्ञाय नमः ||
ॐ सर्ववेदान्तविदे नमः ||
ॐ ब्रह्मपुत्राय नमः ||
ॐ ब्राह्मणेशाय नमः ||
ॐ ब्रह्मविद्याविशारदाय नमः ||
ॐ समानाधिकनिर्मुक्ताय नमः ||
ॐ सर्वलोकवशंवदाय नमः ||
ॐ ससुरासुरगन्धर्ववन्दिताय नमः ||
ॐ सत्यभाषणाय नमः ||
ॐ बृहस्पतये नमः ||
ॐ सुराचार्याय नमः ||
ॐ दयावते नमः ||
ॐ शुभलक्षणाय नमः ||
ॐ लोकत्रयगुरवे नमः ||
ॐ श्रीमते नमः ||
ॐ सर्वगाय नमः ||
ॐ सर्वतो विभवे नमः ||
ॐ सर्वेशाय नमः ||
ॐ सर्वदातुष्टाय नमः ||
ॐ सर्वदाय नमः ||
ॐ सर्वपूजिताय नमः ||
||इति गुरु अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णम् ||
श्री सिद्धि विनायक नामावलि
||श्री सिद्धि विनायक नामावलि ||
ॐ विनायकाय नमः |ॐ विघ्नराजाय नमः |
ॐ गौरीपुत्राय नमः |
ॐ गणेश्वराय नमः |
ॐ स्कन्दाग्रजाय नमः |
ॐ अव्ययाय नमः |
ॐ पूताय नमः |
ॐ दक्षाध्यक्ष्याय नमः |
ॐ द्विजप्रियाय नमः |
ॐ अग्निगर्भच्छिदे नमः |
ॐ इंद्रश्रीप्रदाय नमः |
ॐ वाणीबलप्रदाय नमः |
ॐ सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः |
ॐ शर्वतनयाय नमः |
ॐ गौरीतनूजाय नमः |
ॐ शर्वरीप्रियाय नमः |
ॐ सर्वात्मकाय नमः |
ॐ सृष्टिकर्त्रे नमः |
ॐ देवानीकार्चिताय नमः |
ॐ शिवाय नमः |
ॐ शुद्धाय नमः |
ॐ बुद्धिप्रियाय नमः |
ॐ शांताय नमः |
ॐ ब्रह्मचारिणे नमः |
ॐ गजाननाय नमः |
ॐ द्वैमातुराय नमः |
ॐ मुनिस्तुत्याय नमः |
ॐ भक्त विघ्न विनाशनाय नमः |
ॐ एकदंताय नमः |
ॐ चतुर्बाहवे नमः |
ॐ शक्तिसंयुताय नमः |
ॐ चतुराय नमः |
ॐ लंबोदराय नमः |
ॐ शूर्पकर्णाय नमः |
ॐ हेरंबाय नमः |
ॐ ब्रह्मवित्तमाय नमः |
ॐ कालाय नमः |
ॐ ग्रहपतये नमः |
ॐ कामिने नमः |
ॐ सोमसूर्याग्निलोचनाय नमः |
ॐ पाशांकुशधराय नमः |
ॐ छन्दाय नमः |
ॐ गुणातीताय नमः |
ॐ निरंजनाय नमः |
ॐ अकल्मषाय नमः |
ॐ स्वयंसिद्धार्चितपदाय नमः |
ॐ बीजापूरकराय नमः |
ॐ अव्यक्ताय नमः |
ॐ गदिने नमः |
ॐ वरदाय नमः |
ॐ शाश्वताय नमः |
ॐ कृतिने नमः |
ॐ विद्वत्प्रियाय नमः |
ॐ वीतभयाय नमः |
ॐ चक्रिणे नमः |
ॐ इक्षुचापधृते नमः |
ॐ अब्जोत्पलकराय नमः |
ॐ श्रीधाय नमः |
ॐ श्रीहेतवे नमः |
ॐ स्तुतिहर्षताय नमः |
ॐ कलाद्भृते नमः |
ॐ जटिने नमः |
ॐ चन्द्रचूडाय नमः |
ॐ अमरेश्वराय नमः |
ॐ नागयज्ञोपवीतिने नमः |
ॐ श्रीकांताय नमः |
ॐ रामार्चितपदाय नमः |
ॐ वृतिने नमः |
ॐ स्थूलकांताय नमः |
ॐ त्रयीकर्त्रे नमः |
ॐ संघोषप्रियाय नमः |
ॐ पुरुषोत्तमाय नमः |
ॐ स्थूलतुण्डाय नमः |
ॐ अग्रजन्याय नमः |
ॐ ग्रामण्ये नमः |
ॐ गणपाय नमः |
ॐ स्थिराय नमः |
ॐ वृद्धिदाय नमः |
ॐ सुभगाय नमः |
ॐ शूराय नमः |
ॐ वागीशाय नमः |
ॐ सिद्धिदाय नमः |
ॐ दूर्वाबिल्वप्रियाय नमः |
ॐ कान्ताय नमः |
ॐ पापहारिणे नमः |
ॐ कृतागमाय नमः |
ॐ समाहिताय नमः |
ॐ वक्रतुण्डाय नमः |
ॐ श्रीप्रदाय नमः |
ॐ सौम्याय नमः |
ॐ भक्ताकांक्षितदाय नमः |
ॐ अच्युताय नमः |
ॐ केवलाय नमः |
ॐ सिद्धाय नमः |
ॐ सच्चिदानंदविग्रहाय नमः |
ॐ ज्ञानिने नमः |
ॐ मायायुक्ताय नमः |
ॐ दन्ताय नमः |
ॐ ब्रह्मिष्ठाय नमः |
ॐ भयावर्चिताय नमः |
ॐ प्रमत्तदैत्यभयदाय नमः |
ॐ व्यक्तमूर्तये नमः |
ॐ अमूर्तये नमः |
ॐ पार्वतीशंकरोत्संगखेलनोत्सवलालनाय नमः |
ॐ समस्तजगदाधाराय नमः |
ॐ वरमूषकवाहनाय नमः |
ॐ हृष्टस्तुताय नमः |
ॐ प्रसन्नात्मने नमः |
ॐ सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः |
||इति श्रीसिद्धिविनायकाष्टोत्तरशतनामावलिः ||
Subscribe to:
Comments (Atom)