- ईश्वर है या ईश्वर नहीं है
- मन पर विजय कैसे प्राप्त हो ?
- तपस्या किसे कहते हैं ?
- योगी की परिभाषा
- यज्ञ से परमात्मा कैसे प्राप्त हों ?
- परमात्मा के दर्शन कैसे हों ?
- परमात्मा को पाने की पुकार है जप
- शांति के लिए जरूरी है अंहकार का संहार
- जीवते शरदः शतं - सौ साल जियें
- मन का स्वभाव
- परिस्थिति कैसी भी हो उसका सदुपयोग करें
- दुर्गुणों के हमले में होश ही हमारा हथियार है
- देना होगा जर्रे-जर्रे का हिसाब खुदा के सामने
- सफलता और जीत के बारीक फर्क को समझा जाये
- सुरक्षा का भाव उपजता परमात्मा पर भरोसे से
- बुराई को पहचान कर उसे दूर करने के प्रयास करें
- शरीर के भोजन के साथ ही आवश्यक है आत्मा का भोजन
- आत्मविजेता ही विश्वविजेता
- जीवन में जरूरी है शिक्षा और विद्या का संतुलन
परिस्थिति कैसी भी हो उसका सदुपयोग करें
दुर्गुणों के हमले में होश ही हमारा हथियार है
देना होगा जर्रे-जर्रे का हिसाब खुदा के सामने
सफलता और जीत के बारीक फर्क को समझा जाये
आज जितनी भी शिक्षा, ज्ञान, जानकारियां दी जा रही है, उसमे यह शपथ के रूप में बताया जा रहा है, कि हर काम में और हर हाल में सफल होना ही है चाहे कुछ भी हो जाये. असफल लोग जितनी हताशा और परेशानी में होते है, सफल लोग उससे भी कहीं ज्यादा तनाव और परेशानी में होते है. सफल हो जाये और फिर लगातार सफल बने रहे, यह इरादा ही एक दिन दुराग्रह में बदल जाता है और यह सफलता ही एक दिन नशे का रूप ले लेती है और हर बार सफल होने कि इच्छा हमेशा जीत कि आकांक्षा में बदल जाती है. सफलता और जीत के इस बारीक़ से फर्क को समझ लिया जाये तो यह हमारे जीवन के लिए बहुत लाभदायक होगा. सफलता में स्वयं के हित के साथ ही दूसरों के हित कि कामना भी बनी रहती है. सफल लोग अपनी सफलता में दूसरों का नुकसान नहीं चाहते है, किन्तु जीत तो पराजय के बिना हासिल ही नहीं होती है. दूसरों को पराजित करने में जाने-अनजाने हम कब इर्ष्या, द्वेष, षड़यंत्र का शिकार हो जाते है पता ही नहीं चलता है. जहाँ जीत एक कालकोठरी कि तरह और सफलता खुले कारगर कि तरह है. दुनिया में दो तरह कि जेल होती है. पहली, वो जो दूसरों के लिए बनाई गई है और दूसरी वह जो हमने खुद अपने लिए बनाई है. जो लोग धर्म को नहीं मानते है वे लोग हमेशा दूसरों को हराने के चक्कर में रहते है, जीत उनके लिए नशा बन जाती है, ऐसे लोग जीत ही नहीं हासिल करते, बल्कि साथ ही बहुत सारी अशांति भी प्राप्त कर लेते है. जो लोग धार्मिक होते है, वे लोग जीत कि जगह सफलता पर टिके रहते है, लेकिन पूर्ण शांति से ऐसे लोग भी वंचित रह जाते है. इन दोनों से ऊँची स्थिति है आध्यात्मिक होने की है क्यूंकि अध्यात्मिक व्यक्ति सफलता-असफलता, सुख-दुःख, लाभ-हानि को सामान भाव से लेते है इसलिए अध्यात्मिक लोग कभी भी असफल और दुखी नहीं होते है. इसलिए कर्म और उसके परिणाम को अध्यात्मिक नज़रिए से लिया जाना चाहिए, ना कि केवल सांसारिक नज़रिए लिया जाना चाहिए. आध्यात्म एक ऐसी शक्ति है जिसके सहारे हम सारी हताशा, तनाव और परेशनियों से मुक्ति पा सकते है. आध्यात्म हमे परमात्मा(भागवत गीता) के बताये हुए मार्ग पर ले जाता है और सिर्फ परमात्मा ही हमें सारी हताशा, तनाव और परेशनियों से मुक्ति दिलाने के लिए पर्याप्त है.......इसलिए हे मानव राधे-राधे बोल तेरा क्या लगेगा मोल.
!! जय श्री कृष्णा !!
सुरक्षा का भाव उपजता परमात्मा पर भरोसे से
परमात्मा को पाने की पुकार बन जाता है जप
बुराई को पहचान कर उसे दूर करने के प्रयास करें
!! जय श्रीकृष्ण !!
शरीर के भोजन के साथ ही आवश्यक है आत्मा का भोजन
!! जय श्रीकृष्ण !!
आत्मविजेता ही विश्वविजेता
जीवते शरदः शतं - सौ साल जियें
जीवन में जरूरी है शिक्षा और विद्या का संतुलन
शांति के लिए जरूरी है अंहकार का संहार
ईश्वर है या ईश्वर नहीं है ?
किसी वास्तु की नकारने के लिए भी उसकी विपक्ष की स्वीकृति आवश्यक है जैसे यदि हम कहे की अँधेरा है तो प्रकाश की गैर्मजुदगी ही अँधेरा है
यदि कोई मनुष्य जन्म से अंध है और आप उसे समझाए की नीला रंग कितना मन भवन है तो उसकी प्रतिक्रया क्या होगी
किसी वास्तु की प्राप्ति पर ही उसका निषेध किया जाता है | कोई यह क्यूँ नहीं कहता की इन्सान अंडा नहीं देता क्योंकि जो चाज होती ही नहीं
जो मनुष्य अंग्रेजी भाषा को मानता है तो वह उसे सिखने का अभ्यास कर सकत है | पड़ी करेगा तो उसको अंग्रेजी अ जाएगी पर जो मनुष्य अंग्रेजी भाषा को मंत ही नहीं तो वह उसे सिखने का अभ्यास ही क्यों करेगा | अब दोनों के पास एक तार आया की अमुक व्यक्ति बीमार है तो अंग्रेजी के जानकर ने पड़ा और जाकर देखा तो बात सच निकली परन्तु जिसने अंग्रेजी भाषा को माना ही नहीं तो तो वोह वहां नहीं पहुच पाया
ऐसे ही जो इश्वर प्रप्ति में लगे हिन् उनमे सामान्य मनुष्यों से विशेषत दिखती है उनके संग से, भाषण से शांति मिलती ही केवल मनुष्यों को ही नहीं प्रत्युत पशु पक्षी अदि को भी उनसे शांति मिलती है यह बात अगर कोई चाहे तो इसी जीवन में देख सकता है अथ जिन्हें ईश्वर प्राप्ति हो गयी हो उनकी विलक्षणता आ गयी यदि इश्वर है ही नहीं तो यह विलक्षणता कहाँ से आई|
हर मनुष्य अपने में एक कमी का अप्पोर्नता का अनुभव करता है अगर इस अप्पोर्नता की पूर्ती की कोई चीज नहीं होती तो मनुष्य को अप्पोर्द्ता का अनुभव होता ही नहीं जैसे मनुष्य को भूक लगती है तो सिद्ध होता है की कोई खाद्य वास्तु है प्यास लगती है तो सिद्ध होता है की कोई पेय वस्तु है ऐसे ही मनुष्य को अप्पोर्द्ता का अनुभव होता है तो यह भी सिद्ध है की कोई पूर्द तत्त्व है उस पूर्ण तत्व को ईश्वर कहते हैं
ऐसे ही जब वास्तु होती है उसी को प्राप्त करने की इक्षा होती है जो वस्तु नहीं होती उसको प्राप्त करने की इचा नहीं होती जैसे किसी के मन में यह इक्चा नहीं होती की मैं आकाश के फल खाऊन या आकाश के फुल सुन्ग्हू क्योंकि आकाश में फल फूल लगते ही नहीं मनुष्य की तो यही इक्षअ रहती है की मैं सदा जीता रहूँ कभी न मरुँ सब जान लूँ कोई अज्ञान न रहे सदा सुखी रहूँ कभी दुखी न रहूँ सदा जीता रहूँ यह चित की इक्षा है सब जान लूँ यह सैट की इक्षा है और सदा सुखी रहूँ यह आनंद की इक्षा है इससे भी सिद्ध हुआ की ऐसा कोई सत्चितानंद स्वरोप्प तत्व है जिसको प्राप्त करना मनुष्य चाहता है
कोई भी मनुष्य अपने से किसी को बड़ा मानता है तो उसने वास्तव में इश्वर को स्वीकार कर लिया कुंकी जहाँ बदप्पान्न की परंपरा समाप्त होती है वहीँ इश्वर है पूर्वेषा मापी गुरुह काले न नव चाचे डट पतंजल योग दर्शन १ |२६ कोई व्यक्ति होता है तो उसका पिया होता है और उसके पिता का भी कोई पिता होता है यह परंपरा जहाँ समाप्त होती है उसका नाम ईश्वर है पितासि लोकस्य चराचरस्य ११|४३ कोई बलवान होता है तो उससे भी कोई अदेहिक बलवान होता है यह बलवत्ता की अवधी जहाँ समाप्त होती है उसका नाम इश्वर है क्योंकि उस सामान कोई बक्ल्वान नहीं तात्पर्य यह है की बल बूढी विद्या योग्यता ऐश्वर्य शोभा आदि गुणों की सीमा जहाँ समाप्त होती है वही एश्वारे है क्यूंकि उसके समन कोई नहीं है न त्व तसमो सत्य भी अदिख कुतो अन्य ११\४६
वस्तव में ईश्वर माने का श्रद्धा का विषय है विचार का नहीं क्यूंकि जहाँ तक जाने की सीमा है वहीँ तक विचार संभव है ओपर जो सीम ही उसपर विचार कैसे करिएँ वो तो मन्ना ही पड़ेगा और जिज्ञासा उसी विषय में होती ही जिसके विषय में कुछ जानते हैं और कुछ नही जानते पर जिसके विषय में हम कुछ नहीं जानते उसके विषय में न ही जिज्ञासा होती ही और न ही विचार उसको तो हम मने य न मने इसमें हम स्वतंत्र हैं
मन का स्वभाव
परमात्मा कहते हैं :- तुम एक चेतन आत्मा है , तेरा बंधन और मोक्ष नहीं है , तू एक है और शांत है| इसलिए अब तू नए सिरे से अपने ह्रदय को इन संकल्प विकल्प से दुखी मत कर नहीं तो फिर कर्मों के बंधन रुपी जाल में उलझ जायेगा| यह आत्मा तेरा स्वरुप है जिसे तूने प्राप्त कर लिया है अतः अब तू शांत हो कर आनंद मय हो कर अपने स्वरुप इस आत्मा में सुख पूर्वक स्थित हो|
मंत्र संग्रह
- गणेश गायत्री मंत्र
- महा मृत्युंजय मंत्र
- दुर्गा सप्तश्लोकी
- श्री राधा कृष्ण वंदना
- गायत्री मंत्र
- एक श्लोकी भागवत
- एक श्लोकी रामायण
- दुर्गा नामावलि
- शिव रुद्राष्टक स्त्रोत
- शनि अष्टोत्तरशतनामावलि ( शनिदेव के १०८ नाम )
- श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशत नामावलि ( महा लक्ष्मी के १०८ नाम )
- दुर्गा सप्तशती रहस्य
- श्री राधाकृष्ण सहस्त्रनाम स्तोत्रम्
- सन्तानगोपाल स्तोत्र
- वाल्मीकि कृत श्री गणेश स्तवन
- गणपति अथर्वशीर्ष
- देवी कवच/चण्डी कवच
- श्री कालभैरवाष्टकं
- दुर्गासहस्रनामस्तोत्रम्
- शनैश्चरस्तवराजः
- शनैश्चरस्तोत्रम्
- श्री अङ्गारकाष्टोत्तर शतनामावलि
- चन्द्र अष्टोत्तरशतनामावलिः
- ऋणमोचन मंगल स्तोत्र
- बुध अष्टोत्तरशतनामवलिः
- गुरु अष्टोत्तरशतनामावलिः
- शुक्र अष्टोत्तरशतनामावलिः
- राहु अष्टोत्तरशतनामावलिः
- केतु अष्टोत्तरशतनामावलिः
- द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग स्तोत्रम्
- चन्द्रशेखराष्टकं
- दारिद्र्य दहन शिवस्तोत्रं
- श्रीविश्वनाथाष्टकं
- श्रीवैद्यनाथाष्टकम्
- शिवाष्टकं
- श्री सिद्धि विनायक नामावलि
- श्री गणेश अष्टोतर नामावलि
- श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्
- महालक्ष्मी-कवच
- देवकृत लक्ष्मी स्तोत्रम्
- श्रीलक्ष्मीस्तव
- दशरथकृत शनि स्तोत्र
- शनि वज्र पञ्जर कवच
- श्री विष्णु सहस्त्रनामस्तोत्र
- श्री नारायण कवच
- श्री शीतलाष्टकं
- श्री ऋण-हरण-कर्ता -गणपति-स्तोत्र-मन्त्र
- श्री गोपाल सहस्त्रनामस्तोत्रम्
- श्री-कृष्ण-सहस्त्रनाम-स्तोत्र
एक श्लोकी भागवत
एक श्लोकी रामायण
गायत्री मंत्र
|| ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् ||
भावार्थ :- हम तीनों लोकों के उस वरण करने योग्य देवता की शक्तियों का ध्यान करते हैं, वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।
गायत्री के पाँच मुखों का रहस्य
हे पार्वती! यह संपूर्ण ब्रह्मान्ड जल, वायु, पृथ्वी, तेज और आकाश के पांच तत्वों से बना है | इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राण-शक्ति के रूप में विद्यमान है | ये पांच तत्व ही गायत्री के पांच मुख हैं | मनुष्य के शरीर में इन्हें पांच कोश कहा गया है | ये पांच कोश अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश के नाम से जाने जाते हैं | ये पांच अनंत ऋद्धि सिद्धियों के अक्षय भंडार हैं | इन्हें पाकर जीव धन्य हो जाता है |
पार्वती ने पूछा
हे प्रभु ! इन्हें जाना कैसे जाता है? इनकी पहचान क्या है?
शिवजी बोले
हे पार्वती ! योग साधना से इन्हें जाना जा सकता है, पहचाना जा सकता है | इन्हें सिद्ध करके जीव भव सागर के समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है | जीवन मरण के चक्र से छूट जाता है | जीव के पांच तत्वों की श्रीवृद्धी और पुष्टि इस प्रकार से होती है - 'शरीर' की अन्न से, 'प्राण' की तेज से, 'मन' की नियंत्रण से, 'ज्ञान' की विज्ञान से और 'आनंद' की कला से | गायत्री के पांच मुख इन्हीं पांच तत्वों के प्रतीक हैं |
महा मृत्युंजय मंत्र
भावार्थ :- " हे त्र्यम्बक वेदरूप पुण्यात्मा परमेश्वर ! मृत्यु के पाश से हमको बचाओ, जन्म-मरण से हमें मुक्त करो और हमको अमृतत्व प्रदान करो."
सप्तश्लोकी दुर्गा
देवी ने कहा - हे देव |आपका मेरे उपर बहुत स्नेह है |कलियुग में समस्त कामनाओ को सिद्ध करनेवाला जो साधन है वह बताऊंगी सुनिए ! उसका नाम है "अम्बा-स्तुति " ||
ॐ इस दुर्गा सप्त श्लोकी स्तोत्र मन्त्र के नरायण ऋषि हैं, अनुष्टुप छंद है, श्री महाकाली, महालक्ष्मी, और महासरस्वती देवता हैं, श्री दुर्गा की प्रसन्नता के लिए सप्त श्लोकी दुर्गा पाठ में इसका विनियोग किया जाता है |
वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बल पूर्वक खींच कर मोह में ड़ाल देती हैं || १ ||
माँ दुर्गे ! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्वारा चिंतन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं | दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवी ! आपके सिवा दूसरी कौन हैं, जिसका चित सबका उपकार करने के लिए सदा ही दयाद्र रहता हो || २ ||
नारायणी ! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करनेवाली मंगलमयी हो | कल्याणदायिनी शिवा हो | सब पुरुषार्थों को सिद्ध करनेवाली, शरणागत वत्सला , तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो | तुम्हे नमस्कार है || ३ ||
शरण में आये हुए दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहने वाली तथा सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवी! तुम्हे नमस्कार है|| ४ ||
सर्व स्वरुपा सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से संपन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवी ! सब भयों से हमारी रक्षा करो ; तुम्हे नमस्कार है || ५ ||
देवी तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों का नाश कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो |जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं , उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं | तुम्हारी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं ||६||
सर्वेश्वरी! तुम इसी प्रकार तीनो लोकों की समस्त बाधाओं को शांत करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो ||७ ||
दुर्गा नाममाला
दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी ||
दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहंत्री दुर्गमापहा |
दुर्गमज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ||
दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी |
दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविधया दुर्गमाश्रिता ||
दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी |
दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी ||
दुर्गमासुरसहंत्री दुर्गमायुधधरिणी |
दुर्गमाङगी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी||
दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्ग दारिणी |
नामावलिमिमां यस्तु दुर्गाया मम मानवः पठेत सर्व भयनुमुक्तो भविष्यति न संशयः ||
जो मनुष्य मुझ दुर्गा की इस नाममाला का पाठ करता है वह निःसंदेह सब प्रकार के भयों से मुक्त हो जाएगा |
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राधे राधे राधे श्याम धुन- फाल्गुनी पाठक
श्री राधाकृष्ण वंदना
त्वं माता कृष्ण प्राणाधिका देवी
कृष्ण प्रेममयी शक्ति शुभे
पुजितासी मया सा च या श्री कृष्णेन पूजिता
कृष्ण भक्ति प्रदे राधे नमस्ते मंगल प्रदे
मन पर विजय कैसे प्राप्त हो ?
मुस्लिम और में एक ही भगवान को मानते हे। हिन्दू धर्म मे इतने सरे देवी देवताओ को क्यों ?
मेरे इस उत्तर का उद्देश्य किसी की धार्मिकता को ठेस पहुँचाना नहीं है यदि किसी को ऐसा लगे तो मुझे क्षमा करिएँगा |
मुस्लिम धर्म की बुनियाद मोहममद साहब और क्रिश्चन धर्म की बुनियाद जिसस क्राईस्ट हैं परन्तु दोनों ही ने अपने जीवन काल में कभी यह नहीं कहा की वे स्वयं खुदा या परमेश्वर हैं बल्कि सदा यही कहा है की वे खुदा के पैगम्बर हैं या परमेश्वर के पुत्र हैं इसका अर्थ यही हुआ की परमात्मा या खुदा कहीं और है |
परन्तु जब हम सनातन धर्म की बात करे तो यहाँ ऐसे विलक्षण विभूतियों ने जनम लिया जिन्होंने न सिर्फ स्वयं को परमात्मा कह कर संबोधित किया बल्कि हम आम मानवों के भी परमात्मा होने की संभावनाओ पर प्रकाश डाला
हमारे धर्म में ३३ करोड़ देवी देवताओं का विवरण आता है और इस सृष्टी में जितने भी छोटे बड़े पदार्थ हैं सभी को देवी अथवा देवता का दर्जा मिला है जिसमे की आपकी कल्पना
कल्पना कीजिये एक ऐसी कंपनी जिसमे ३३ करोड़ एम्प्लोयीस हैं तथा सब कंपनी के नियमों के तहत अपना अपना डिपार्टमेंट सम्हाल रहे हैं पर इन सब कर्मचारियों का भी जो बॉस है वह अपनी सारी जिम्मेदारियां इन कर्मचारियों के भरोसे छोड़ कर स्वयं पूर्ण रूप से मुक्त है | पर ये बॉस भी एक जिम्मेदारी का निर्वहन करते हैं और वह है अपने भक्तों की जिम्मेदारी | यह डिपार्टमेंट उन्होंने स्वयं के लिए रख छोड़ा है क्यूंकि
तपस्या किसे कहते हैं ?
जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय, और हित कारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद शास्त्रों के पढने का एवं परमेश्वर के नाम-जप कारक अभ्यास है, वही वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है |
और मन की प्रसन्नता, शांत भाव, भगवान का चिंतन करने का स्वाभाव, मन का निग्रह एवं अंतःकरण के भावों की भली-भांति पवित्रता इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है |
योगी की परिभाषा
यज्ञ से परमात्मा कैसे प्राप्त हों ?
परमात्मा के दर्शन कैसे हों ?
मैं ही सब प्राणियों के ह्रदय में अंतर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विचार के द्वारा बुद्धि में रहने वाले संशय होते हैं और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ तथा वेद ,वेदों का अंत कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ
मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों को भोगने वाला, संपूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर, तथा संपूर्ण भूत प्राणियों का सुह्र्द अर्थात स्वार्थ रहित दयालु और प्रेमी ऐसा तत्व से जानकर शांति को प्राप्त होता है |
अथवा इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है मैं इस संपूर्ण जगत को अपनी योग शक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ
