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गीता प्रसार 

परिस्थिति कैसी भी हो उसका सदुपयोग करें

परिस्थिति कैसी भी हो उसका सदुपयोग करें
असली नायक वही होगा जो समय का सदुपयोग करेगा. महाभारत युद्ध के असली नायक श्रीकृष्ण ही थे. उन्होंने गीता सुनाकर अपने ज्ञान का परिचय दिया और साबित किया की बिना ज्ञान के नायक नहीं बना जा सकता है. उन्होंने बताया की उनका ज्ञान गीता का ज्ञान है, सम्पूर्ण जीवन के लिए खरा ज्ञान है. पुरे युद्ध की योजना, क्रियान्वयन और परिणाम में गीता ही अपनाई गई. अर्जुन को निमित्त बनाकर श्रीकृष्ण ने पुरे मानव समाज के कल्याण की बात कही. गीता में यह व्यक्त हुआ है की कैसी भी परिस्थिति आये, उसका सदुपयोग करना है. १८ अध्याय में श्रीकृष्ण ने जीवन के हर क्षेत्र में उपयोगी सिद्धांतो की व्याख्या की है. युद्ध के मैदान से गीता ने निष्काम कर्मयोग का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दिया है की "कर्म करो फल की चिंता ना करो" यही निष्काम कर्म है. यदि निष्कामता है तो सफल होने पर अहंकार नहीं आयेगा और असफल होने पर अवसाद(दुःख) नहीं होगा. निष्कामता का अर्थ है कर्म करते वक्त कर्ताभाव का अभाव. महाभारत में गीता की अपनी अलग चमक है. इसी प्रकार जीवन में 'ज्ञान' का अपना एक अलग महत्व है. श्रीकृष्ण ने पांडवों की हर संकट से रक्षा की और अपने ज्ञान के बल पर सत्य की विजय के पक्ष में अपनी भूमिका निभाई. कौरवों के पक्ष में एक से बढ़कर एक योद्धा और पराक्रमी थे जिसमे भीष्म सर्वश्रेष्ठ थे. कर्ण हो या द्रोण, इस बात के प्रति नतमस्तक थे की श्रीकृष्ण के ज्ञान के आगे वे कुछ भी नहीं है. युद्ध में शस्त्र ना उठाने का निर्णय श्रीकृष्ण ले ही चुके थे, अतः वीरता का प्रदर्शन का तो कोई अवसर था ही नहीं. ऐसे में श्रीकृष्ण का सारा पराक्रम उनके ज्ञान पर ही आधारित था और सबने उनके इसी बुद्धि-कौशल का लोहा माना. 'गीता' इसी का प्रमाण है. इसीलिए तो जरा मुस्कुराइए ...................राधे-राधे. !! जय श्रीकृष्ण !!

दुर्गुणों के हमले में होश ही हमारा हथियार है

दुर्गुणों के हमले में होश ही हमारा हथियार है
युद्ध का नियम है कि जितना शत्रु को समझ सको समझ लो, बिना समझे आक्रमण मत करना, लेकिन शत्रु से ज्यादा समझ अपने शस्त्र कि रखना. जीवन में सबसे बड़ा और खतरनाक आक्रमण दुर्गुणों का है. इसके पास वासना जैसे शुक्ष्म हथियार होते है और भी कई शक्लों में अस्त्र-शस्त्र है दुर्गुणों के पास, लेकिन मनुष्य के पास इस आक्रमणसे अपनी सुरक्षा के लिए एक ही हथियार है और उसे कहा गया बुद्धि, भक्ति, प्रज्ञा या सामान्य भाषा में होश का हथियार. दुर्गुणों के हमले में आपका होश ही आपका हथियार है. दुर्गुणों के आक्रमण में भागना नहीं चाहिए. जीवन में काम, क्रोध, लोभ, अहंकार आएंगे ही सही, इनके दमन के चक्कर में मत पड़िए. आप जितना दबायेंगे, ये उतनी ही तेजी से आपको पलटकर धक्का देंगे. सीधा आमना-सामना परेशानी बड़ा देगा. इनसे सीधे मत लड़िये, बस इन पर ध्यान दीजिये. होश यानि आपका जग जाना और दुर्गुणों के मच्छर मूर्छा तथा निद्रा के जल में पनपते है, सुरक्षित रहते है. आप जागे, तो इन्हें जाना ही पड़ेगा, बिल्कुल ऐसे जैसे प्रकाश आने पर अंधकार को प्रस्थान करना ही पड़ता है. रोशनी, अँधेरे को खा जाती है. होश दुर्गुणों को पचा जाता है. होश कि अपनी ऐसी गर्माहट होती है जिसमे वासना कि बर्फ पिघल जाती है. यहाँ दुर्गुणों के सामने 'भागना मत' बड़ी महत्वपूर्ण बात है, वैसे ही रुक जाना.जैसे अर्जुन को श्री कृष्णा ने रोका था कुरुक्षेत्र में. श्रीकृष्णा आज भी हमारे साथ है, बस हमें अर्जुन बनने कि तैयारी रखनी है. श्रीकृष्णा हमेशा कहते थे इसकी शुरुआत तब ही होगी, जब आप जरा मुस्कुरायेंगे.......राधे-राधे !! जय श्रीकृष्ण !!

देना होगा जर्रे-जर्रे का हिसाब खुदा के सामने

देना होगा जर्रे-जर्रे का हिसाब खुदा के सामने
वैराग्य किसी के भी भीतर उतरे, होता उसका अपना शाही अंदाज़ है. संत-फकीरों को आज भी इसलिए याद किया जाता है कि उनके भीतर उतरे वैराग्य ने उनकी जीवनशैली को एक अलग ही ढंग दे दिया था. मुस्लिम संत हातमअसम चीजों को बड़े मजेदार ढंग से समझाया करते थे. एक बार उन्होंने स्वर्ग और नर्क को लेकर उन्होंने बड़ी गहरी और रोचक व्याख्या की . वे किसी कि दावत में गए हुए थे, दावत तीन शर्तों पर मंजूर कि गई थी. पहली- जहाँ चाहूँगा बेठुंगा और जब बेठने का मौका आया तो वे जूते-चप्पलों के पास जाकर बेठ गए. दूसरी शर्त थी जितना चाहूँगा, उतना ही खाऊंगा और बहुत गुजारिश के बाद भी उन्होंने दो ही रोटियां खाई. उनकी तीसरी शर्त थी जो में कहूँगा, वैसा ही करना होगा और उन्होंने एक तवा मंगवाया और वे उस गरम तवे पर खड़े हो गए. आसमान कि तरफ देखकर बोले- मैंने दो रोटियां खाई है. फिर तवे पर से उतरे और वहां मौजूद लोगों से कहा- यदि तुम्हे इस बात का यकीन है कि क़यामत में जर्रे-जर्रे का हिसाब देना होता है तो इस तवे पर खड़े हो जाओ. लोगों ने कहा- हमें यकीन तो है लेकिन हम इस तवे पर खड़े नहीं हो सकते. हातमअसम बोले- जब आप इस तवे पर खड़े होकर अपने गुजारे हुए एक दिन का हिसाब नहीं दे सकते तो क़यामत के दिन उस जमीन पर खड़े होकर, जहाँ केवल आग ही आग होगी, सारी जिंदगी का हिसाब कैसे दोगे. यहाँ फ़कीर ने समझाया है कि जो भी इस जिंदगी में कर रहे हो, ऊपर कोई इसका हिसाब रख रहा है. इसलिए अपने जमीर को साफ़ रखो क्योंकि जबाब एक दिन देना ही है.

सफलता और जीत के बारीक फर्क को समझा जाये

सफलता और जीत के बारीक फर्क को समझा जाये



आज जितनी भी शिक्षा, ज्ञान, जानकारियां दी जा रही है, उसमे यह शपथ के रूप में बताया जा रहा है, कि हर काम में और हर हाल में सफल होना ही है चाहे कुछ भी हो जाये. असफल लोग जितनी हताशा और परेशानी में होते है, सफल लोग उससे भी कहीं ज्यादा तनाव और परेशानी में होते है. सफल हो जाये और फिर लगातार सफल बने रहे, यह इरादा ही एक दिन दुराग्रह में बदल जाता है और यह सफलता ही एक दिन नशे का रूप ले लेती है और हर बार सफल होने कि इच्छा हमेशा जीत कि आकांक्षा में बदल जाती है. सफलता और जीत के इस बारीक़ से फर्क को समझ लिया जाये तो यह हमारे जीवन के लिए बहुत लाभदायक होगा. सफलता में स्वयं के हित के साथ ही दूसरों के हित कि कामना भी बनी रहती है. सफल लोग अपनी सफलता में दूसरों का नुकसान नहीं चाहते है, किन्तु जीत तो पराजय के बिना हासिल ही नहीं होती है. दूसरों को पराजित करने में जाने-अनजाने हम कब इर्ष्या, द्वेष, षड़यंत्र का शिकार हो जाते है पता ही नहीं चलता है. जहाँ जीत एक कालकोठरी कि तरह और सफलता खुले कारगर कि तरह है. दुनिया में दो तरह कि जेल होती है. पहली, वो जो दूसरों के लिए बनाई गई है और दूसरी वह जो हमने खुद अपने लिए बनाई है. जो लोग धर्म को नहीं मानते है वे लोग हमेशा दूसरों को हराने के चक्कर में रहते है, जीत उनके लिए नशा बन जाती है, ऐसे लोग जीत ही नहीं हासिल करते, बल्कि साथ ही बहुत सारी अशांति भी प्राप्त कर लेते है. जो लोग धार्मिक होते है, वे लोग जीत कि जगह सफलता पर टिके रहते है, लेकिन पूर्ण शांति से ऐसे लोग भी वंचित रह जाते है. इन दोनों से ऊँची स्थिति है आध्यात्मिक होने की है क्यूंकि अध्यात्मिक व्यक्ति सफलता-असफलता, सुख-दुःख, लाभ-हानि को सामान भाव से लेते है इसलिए अध्यात्मिक लोग कभी भी असफल और दुखी नहीं होते है. इसलिए कर्म और उसके परिणाम को अध्यात्मिक नज़रिए से लिया जाना चाहिए, ना कि केवल सांसारिक नज़रिए लिया जाना चाहिए. आध्यात्म एक ऐसी शक्ति है जिसके सहारे हम सारी हताशा, तनाव और परेशनियों से मुक्ति पा सकते है. आध्यात्म हमे परमात्मा(भागवत गीता) के बताये हुए मार्ग पर ले जाता है और सिर्फ परमात्मा ही हमें सारी हताशा, तनाव और परेशनियों से मुक्ति दिलाने के लिए पर्याप्त है.......इसलिए हे मानव राधे-राधे बोल तेरा क्या लगेगा मोल.

!! जय श्री कृष्णा !!

सुरक्षा का भाव उपजता परमात्मा पर भरोसे से

सुरक्षा का भाव उपजता परमात्मा पर भरोसे से


भक्त भगवान पर भरोसा करते है और सुरक्षा कि गारंटी भी चाहते है. हम जितना संसार से अपने आपको सुरक्षित रखना चाहेंगे, हमें परमात्मा के प्रति विश्वाश पैदा करने में उतनी ही परेशानी आयेगी. संसार में रहकर हम प्रयास करते है कि सुरक्षा का एक घेरा हमारे आसपास बन जाये. हमारे लिए कभी-कभी परमात्मा भी सुरक्षा करने कि वस्तु बन जाता है, जबकि होना चाहिए विश्वास. आप परमात्मा पर भरोसा रखिये, उसके बाद भूल जाईये कि आप सुरक्षित है या असुरक्षित, बाकि काम ईश्वर पर छोड़ दीजिये. भगवान हमेशा भक्तों से कहते है, तुम लोग सुखद सम्भावना के पात्र हो. इसलिए असंतोष और असमंजस से बाहर निकलो. भगवान तीन तरह के भक्तों को सावधान करते हुए कहते है, मैं उन लोगों से नाराज रहता हूँ जो लोग अन्याय करते है, जो सीधे-सीधे अन्याय सहते है और तीसरे वे लोग जो इन दोनों स्थितियों को देखते है. इस मामले में मुझे मूकदर्शक और गैर-जिम्मेदार लोग पसंद नहीं है. मैं अपने भक्तों का अंतिम समय तक और पुनः आरम्भ तक साथ देता हूँ. मेरे पास सुधार कि सम्भावना के अनेक अवसर है जो मैं अपने भक्तों के लिए सुरक्षित रखता हूँ. फिर भी भक्त है कि वे मुझे ही धोखा देने कि कोशिश करते है. हम भक्तों को यह समझना होगा कि अभी तक वह धूल नहीं बनी जो भगवन कि आँखों में झोंकी जा सके. भवन में रहो, भवन को अपने भीतर मत रखो. धन आपके खाते में रहे, दिल में न हो. ह्रदय में भगवान के प्रति विश्वास हो तो देह को भले ही संसार में उतार दें, फिर खतरा नहीं रहेगा. इसके अभ्यास में जरा मुस्कुराइए.......राधे-राधे

!! जय श्री कृष्ण !!

परमात्मा को पाने की पुकार बन जाता है जप

परमात्मा को पाने की पुकार बन जाता है जप
शरीर सद्कर्मो और मन सद्विचारों से संवरेगा. सद्विचार संवरते है सिमरन से, सिमरन के लिए शब्द-नाम की ताकत चाहिए. नाम महिमा के लिए गुरुनानक देव ने कहा है 'शब्दे धरती, शब्द अकास, शब्द-शब्द भया परगास.सगळी सृस्ट शब्द के पीछे, नानक शब्द घटे घट आछे.' इस शब्द ने धरती, सूर्य, चंद्रमा सारी दुनिया पैदा की है. यही शब्द सबके भीतर अपनी धुनकारें दे रहा है. इस नाम की खोज की जाये जो सबके भीतर है. सभी संत-फकीरों ने अध्यात्म को समझने के लिए अपने-अपने शब्द दिए है जो बाद में नाम-वंदना बन गए. गुरुनानक साहिब ने इसे गुरुबानी, सचिवाने, अकथ-कथ, हुकुम, हरी कीर्तन कहा है. ऋषि मुनियों ने इसे कभी आकाशवाणी कहा तो कभी रामधुन. चीनी गुरुओं ने ताओ, मुस्लिम फकीरों ने कलमा बताया. ईसा मसीह इसे लोगास बता गए.लेकिन फकीरों ने जो शब्द बताया है, इसे हम केवल ऐसे शब्दों से ना जोड़े ले जो जबान से निकलते है.हमारे शरीर के भीतर नाम अपनी एक अलग अनुभूति रखते है. जब हम ध्यान करते है तो ये नाम या गुरुमंत्र केवल बोलने के शब्द बनकर नहीं बल्कि पुरे ध्यान में अपना नांद देते है, गूँज ध्वनि देते है. यह भीतरी अनुगूंज हमें गहरे ध्यान में उतरती है. कई लोगों को तो गुरुनानक साहिब के वाहेगुरु संबोधन ने भी ध्यान में उतार दिया. यह नाम जप एक पुकार बन जाता है. परमात्मा को पाने के लिए हम जब आतुर होते है और उस आतुरता में जो शब्द उच्चारित होते है, वे नाम जप बन जाते है. निरंतरता बनाये रखिये, एक दिन परमात्मा आपको मिल ही जायेगा.........राधे-राधे !! जय श्रीकृष्ण !!

बुराई को पहचान कर उसे दूर करने के प्रयास करें

बुराई को पहचान कर उसे दूर करने के प्रयास करें


यदि ध्येय मिलने या सफलता प्राप्त हो जाने पर भी किसी को शांति ना मिले तो समझ ले कि रास्ता गलत चुन लिया गया है. गलतियाँ और बुराई किसमे नहीं होती है. यदि हम इनसे लड़ेंगे तो परिणाम उल्टे ही आयेंगे. हम जो भी काम करेंगे, उसमे अशांति हाथ लगेगी. यदि हमारे अन्दर क्रोध जैसी बुराई तो क्रोध को दबाने का प्रयास नहीं करें. कोशिश करें कि क्रोध चला जाये. उसे दबाने में नहीं, उसके जाने में शांति है. जैसे हिंसा का आभाव अहिंसा है. लोग गलत समझते है कि हिंसा का उल्टा अहिंसा है. हम यदि घृणा को दबाकर प्रेम लाने का प्रयास करेंगे जैसा कि ज्यादातर लोग करते है तो प्रेम सच्चा नहीं होगा. सच तो यह है कि घृणा का आभाव ही प्रेम है. अध्यात्म कहता है कि पहले अपनी बुराई को पहचाने, सीधे उससे लड़ने ना लग जायें. हम अपनी बुराई को जितना जानेंगे, पहचानेंगे बुराई उतनी ही कम होने लगेगी, विदा हो जायेगी. इस क्रिया का नाम संयम होता है. जब हम संयमित होंगे,तब हम पायेंगे कि कार्य के बाद सफलता के पश्चात् हम अशांत नहीं रहेंगे,हमे परम शांति का अनुभव होगा.........राधे-राधे

!! जय श्रीकृष्ण !!

शरीर के भोजन के साथ ही आवश्यक है आत्मा का भोजन

शरीर के भोजन के साथ ही आवश्यक है आत्मा का भोजन
ध्यान, मेडिटेशन एक तरह का यज्ञ है. इस ध्यान यज्ञ में शरीर की आहुति देनी पड़ती है. शरीर के भोजन से तो हम परिचित है लेकिन आत्मा के भोजन के प्रति लापरवाह. आत्मा का भोजन है ज्ञान. ज्ञान वह नहीं जो जानकारी बदाये या विषय का शिक्षक बना दे बल्कि वह ज्ञान जो होश जगा दे. ज्ञान और जागरूकता का फर्क समझा जाये. शरीर को उपवास से नियमित किया जाये या जितना जरूरी हो उतना ही खिलाया जाये पर आत्मा को इसके भोजन ज्ञान (होश जगाने वाले) से भरपूर रखा जाये. ज्यादातर मौकों पर हमारी आत्मा भूखी रह जाती है. संत-फकीरों और हमारी शैली में फर्क है. जो लोग आत्मा के भोजन को जानते है, उनके जीने का अंदाज बदल जाता है. एक बार मेरे मित्र ने मुझसे पुछा कि आजकल आप सभी से अदब से मिलते हो, मैंने आपको अकेले में भी ऐसे ही देखा है. मैंने कहा भाई भीड़ में लोगों का अदब करूँ और अकेले में ईश्वर का अदब ना करूँ...ये क्या बात हुई ? मैं हमेशा अपने दोस्तों से कहता हूँ कि जब तक संदेह हो, प्रमाण ना मिले, तब तक मेरी बात का भरोसा मत करना.......राधे-राधे
!! जय श्रीकृष्ण !!

आत्मविजेता ही विश्वविजेता

आत्मविजेता ही विश्वविजेता
साधना से तात्पर्य है' आत्मानुशासन' .

अपने ऊपर विजय प्राप्त करने वाले को सबसे बढकर योद्धा माना गया है. दूसरो पर आक्रमण करना सरल है,बेखबर लोगों पर हमला करना तो और भी सरल है, इसलिए आक्रमणकारियो को योद्धा कहने का औचित्य कम ही है . असली शत्रु हमारे कुसंस्कार है, जो पशु-प्रवृतियों के रूप में अन्तरंग की उत्कृष्टता को दबाए बेठे है और उत्कृष्टता की द्रष्टि में एक कदम बढाने की तैयारी करते ही भारी अड़चन बनकर द्वार रोकते है . इनसे निपटना कम बहादुरी का काम नहीं है.
घुन लकड़ी को और विषाणु स्वास्थ्य को चौपट करते है. व्यसन और दुर्गुण ही मनुष्य को नीचे गिराते है और उसके अभ्युदय का कोई प्रयास सफल नहीं होने देते. यदि हम अपने असली शत्रुओं को समझ पाएं और उनकी जड़ों को उखाड़ पाएं तो समझना चाहिए कि परमपुरुषार्थ कर गुजरने में सफलता पाई. ऋषि-मनीषी इसलिए बार-बार यह कहते आये है- "अपने को जानो, अपने को पहचानो, देखो और सुनने का प्रयास करो." इसका भावार्थ यही है कि अपने अन्दर क्या है, इसे हमसे अच्छा कौन जान सकता है ! दूसरों के दोष देखना सरल है, अपने दोष देख पाना सबसे कठिन . जो ऐसा आत्मपरिष्कार कर लेता है, वह आत्मविजेता ही विश्वविजेता कहलाता है...............राधे-राधे

जीवते शरदः शतं - सौ साल जियें

जीवते शरदः शतं - सौ साल जियें
आयुर्वेद कहता है- नेत्रों को जल से धोना, प्रतिदिन व्यायाम करना, पैरो के तलवे में तेल लगाना-ये प्रयोग जरा और व्याधिनाशक है. जो वसंत ऋतू में नित्य भ्रमण करता है, स्वल्प मात्रा में अग्निसेवन तथा उचित आहार लेता है. ग्रीष्म ऋतू में जो सरोवर के शीतल जल में स्नान करता, घिसा चन्दन लगता और वायु सेवन करता है. वर्षा ऋतू में जो गरम जल से नहाता, वर्षा के जल का सेवन नहीं करता और ठीक समय पर परिमित भोजन करता है, उसे कभी वृधावस्था प्राप्त नहीं होती. जो शरद ऋतू की प्रचंड धूप का सेवन ना कर उसमें घूमता-फिरता नहीं तथा कुएं या बाबडी के जल से नहाता और सीमित भोजन करता है, जो हेमंत ऋतू में प्रातःकाल पोखरे के जल से स्नान कर यथासमय आग तापता है, तुंरत तैयार हुई गरमागरम रसोई खाता है तथा जो शिशिर ऋतू में गरम कपडे पहनता, प्रज्वलित अग्नि पर नए-नए बने गरम अन्न का सेवन करता है तथा गरम जल से ही स्नान करता है, उसे कभी वृधावस्था छू भी नहीं सकती. जो भूख लगने पर ही उत्तम खाना खाता है, सदा शाकाहार करता, प्रतिदिन ताजा दही, ताजा मक्खन और गुड़ खाता, संयम से रहता है, उसे जरावस्था कभी नहीं सताती. सदा स्वस्थ रहने के लिए सदा मुस्कुराते रहिये...राधे-राधे

जीवन में जरूरी है शिक्षा और विद्या का संतुलन

जीवन में जरूरी है शिक्षा और विद्या का संतुलन
शिक्षा के विस्तार को इस युग में खूब लाभ मिला, परन्तु एक हानि भी हुई कि पड़े-लिखे अशांत हो गए. आज की शिक्षा सेवा का माध्यम होना थी, जो शोषण का कारण बनती गई. ये केवल शिक्षा के खतरे है. आचार्य श्रीराम शर्मा कहा करते थे- केवल शिक्षा ही नहीं, विद्या की भी आवश्यकता है . शिक्षा केवल बाहरी जानकारी देती है और विद्या भीतरी अनुभूतियाँ कराती है. शिक्षा संस्थानों, पुस्तकों, और अन्य तकनीकी माध्यमों से प्राप्त होती है. किन्तु विद्या का आरंभ होता है मौलिक चिंतन से. शिक्षा विचार देती है और विद्या विचार को आचार से जोड़ती है. शिक्षा के लिए खूब शिक्षक मिल जायेंगे लेकिन विद्या के लिए तो गुरु दूंदना< ही पड़ेगा.विद्या कहती है थोड़ा संयम साधो, आज के युग में निजी आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं को संभालना ही संयम है और सद्कार्य, सदभाव का विस्तार करना ही सेवा है. विद्या अपने साथ संयम और सेवा लाती है. किन्तु केवल शिक्षा लूट और शोषण करना सिखा रही है. केवल शिक्षा ने लोगों कि खोपड़ी और जेब भर दी पर निजी व्यक्तित्व को खोखला कर दिया. केवल शिक्षा लोगों कि आदतें बना देती है और विद्या स्वभाव तैयार करती है, आदतें ध्यान में बाधा है इसलिए शिक्षित पुरुष मेडिटेशन में मुश्किल से उतर पाता है. यदि उसे विद्या का सहारा मिला तो वह अधिक योग्य होकर ध्यान में उतर जायेगा. केवल शिक्षा खतरनाक है और केवल विद्या भी उपयोगी नहीं होगी.दोनों के संतुलन में ही जीवन का आनंद है.एक काम इसमें उपयोगी है जरा मुस्कुराइए ...राधे-राधे

शांति के लिए जरूरी है अंहकार का संहार

शांति के लिए जरूरी है अंहकार का संहार
जब तक हम अपने अंहकार का संहार नही करेंगे, शांति नहीं पा सकेंगे. आध्यात्म से अंहकार को गलाने के कई तरीके है. उनमे से एक है काल के प्रति अनुभूति बनाये रखना. मृत्यु आनी है और एक दिन सबकुछ यहीं छूट जाना है, फिर कैसा मेरा-तेरा. यह बोध अंहकार को समाप्त करने में सहायक है. काल का भय मनुष्य को अंहकार से जोड़कर रखता है. जब तक अंहकार है, परमात्मा से मिलने कि सम्भावना नहीं है. जिसका ऐसा भय जाता रहा, उसका अंहकार जाता रहा. अहंकार को आदत होती है कदिन में प्रवेश करने की, लेकिन परमात्मा सरलतम है, उसे पाना हो तो सरल होना पड़ेगा. हम अपने आप को परमात्मा से अलग मानते है और यहीं से भटकाव शुरू हो जाता है. इस भिन्नता में ही अंहकार है. सच तो यह है कि जैसे पानी की एक बूँद में पूरा सागर समाया है, वैसे ही हमारे क्षुद्र रूप में परमात्मा का विराट स्वरुप समाया है. परमात्मा में घोल लें स्वयं को. जब भक्त और भगवान एक-दुसरे में समां जायें तो फिर काल का डर कैसा, यहीं से अंहकार भी समाप्त हो जाता है. डर ना हो तो जरा मुस्कुराइए. .......राधे-राधे

ईश्वर है या ईश्वर नहीं है ?

ईश्वर है या ईश्वर नहीं है ?
एक पक्ष कहता है की ईश्वर नही है और आस्तिक पक्ष कहता है की ईश्वर है | अगर ईश्वर नहीं है यही सत्य है तो नास्तिक और आस्तिक दोनों बराबर ही रहे क्यूंकि ईश्वर को मानने वालो की कोई हानि नहीं हुई परन्तु यदि ईश्वर है तो ईश्वर को मानने वाले पक्ष को तो परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है पर ईश्वर को न मानने वाला तो इस रस से हमेशा अनजान ही रह जायेगा |
किसी वास्तु की नकारने के लिए भी उसकी विपक्ष की स्वीकृति आवश्यक है जैसे यदि हम कहे की अँधेरा है तो प्रकाश की गैर्मजुदगी ही अँधेरा है

यदि कोई मनुष्य जन्म से अंध है और आप उसे समझाए की नीला रंग कितना मन भवन है तो उसकी प्रतिक्रया क्या होगी

किसी वास्तु की प्राप्ति पर ही उसका निषेध किया जाता है | कोई यह क्यूँ नहीं कहता की इन्सान अंडा नहीं देता क्योंकि जो चाज होती ही नहीं

जो मनुष्य अंग्रेजी भाषा को मानता है तो वह उसे सिखने का अभ्यास कर सकत है | पड़ी करेगा तो उसको अंग्रेजी अ जाएगी पर जो मनुष्य अंग्रेजी भाषा को मंत ही नहीं तो वह उसे सिखने का अभ्यास ही क्यों करेगा | अब दोनों के पास एक तार आया की अमुक व्यक्ति बीमार है तो अंग्रेजी के जानकर ने पड़ा और जाकर देखा तो बात सच निकली परन्तु जिसने अंग्रेजी भाषा को माना ही नहीं तो तो वोह वहां नहीं पहुच पाया

ऐसे ही जो इश्वर प्रप्ति में लगे हिन् उनमे सामान्य मनुष्यों से विशेषत दिखती है उनके संग से, भाषण से शांति मिलती ही केवल मनुष्यों को ही नहीं प्रत्युत पशु पक्षी अदि को भी उनसे शांति मिलती है यह बात अगर कोई चाहे तो इसी जीवन में देख सकता है अथ जिन्हें ईश्वर प्राप्ति हो गयी हो उनकी विलक्षणता आ गयी यदि इश्वर है ही नहीं तो यह विलक्षणता कहाँ से आई|

हर मनुष्य अपने में एक कमी का अप्पोर्नता का अनुभव करता है अगर इस अप्पोर्नता की पूर्ती की कोई चीज नहीं होती तो मनुष्य को अप्पोर्द्ता का अनुभव होता ही नहीं जैसे मनुष्य को भूक लगती है तो सिद्ध होता है की कोई खाद्य वास्तु है प्यास लगती है तो सिद्ध होता है की कोई पेय वस्तु है ऐसे ही मनुष्य को अप्पोर्द्ता का अनुभव होता है तो यह भी सिद्ध है की कोई पूर्द तत्त्व है उस पूर्ण तत्व को ईश्वर कहते हैं

ऐसे ही जब वास्तु होती है उसी को प्राप्त करने की इक्षा होती है जो वस्तु नहीं होती उसको प्राप्त करने की इचा नहीं होती जैसे किसी के मन में यह इक्चा नहीं होती की मैं आकाश के फल खाऊन या आकाश के फुल सुन्ग्हू क्योंकि आकाश में फल फूल लगते ही नहीं मनुष्य की तो यही इक्षअ रहती है की मैं सदा जीता रहूँ कभी न मरुँ सब जान लूँ कोई अज्ञान न रहे सदा सुखी रहूँ कभी दुखी न रहूँ सदा जीता रहूँ यह चित की इक्षा है सब जान लूँ यह सैट की इक्षा है और सदा सुखी रहूँ यह आनंद की इक्षा है इससे भी सिद्ध हुआ की ऐसा कोई सत्चितानंद स्वरोप्प तत्व है जिसको प्राप्त करना मनुष्य चाहता है

कोई भी मनुष्य अपने से किसी को बड़ा मानता है तो उसने वास्तव में इश्वर को स्वीकार कर लिया कुंकी जहाँ बदप्पान्न की परंपरा समाप्त होती है वहीँ इश्वर है पूर्वेषा मापी गुरुह काले न नव चाचे डट पतंजल योग दर्शन १ |२६ कोई व्यक्ति होता है तो उसका पिया होता है और उसके पिता का भी कोई पिता होता है यह परंपरा जहाँ समाप्त होती है उसका नाम ईश्वर है पितासि लोकस्य चराचरस्य ११|४३ कोई बलवान होता है तो उससे भी कोई अदेहिक बलवान होता है यह बलवत्ता की अवधी जहाँ समाप्त होती है उसका नाम इश्वर है क्योंकि उस सामान कोई बक्ल्वान नहीं तात्पर्य यह है की बल बूढी विद्या योग्यता ऐश्वर्य शोभा आदि गुणों की सीमा जहाँ समाप्त होती है वही एश्वारे है क्यूंकि उसके समन कोई नहीं है न त्व तसमो सत्य भी अदिख कुतो अन्य ११\४६

वस्तव में ईश्वर माने का श्रद्धा का विषय है विचार का नहीं क्यूंकि जहाँ तक जाने की सीमा है वहीँ तक विचार संभव है ओपर जो सीम ही उसपर विचार कैसे करिएँ वो तो मन्ना ही पड़ेगा और जिज्ञासा उसी विषय में होती ही जिसके विषय में कुछ जानते हैं और कुछ नही जानते पर जिसके विषय में हम कुछ नहीं जानते उसके विषय में न ही जिज्ञासा होती ही और न ही विचार उसको तो हम मने य न मने इसमें हम स्वतंत्र हैं

मन का स्वभाव

मन का स्वभाव
मन का स्वभाव है संकल्प विकल्प | जब उसमे संकल्प विकल्पों की लहरें उठती हैं तो मन व्याकुल होता है, इन लहरों का नाम ही मन है |इस संकल्प विकल्प के करण ही कल्पना उत्पन्न होती है, योजनाये बनती हैं, उनको पूरा करने के उपाय ढ़ूँढ़े जाते हैं| इनको पूरा करने के लिए शरीर और इन्द्रियां भी सक्रिय होते हैं, तब व्यक्ति कर्म करता है | अभिमान के करण वह कर्ता बनता है जिससे कर्मों का बंधन बनता है, नए संस्कार बनते हैं , इस प्रकार पूरा कर्म जाल बनकर तैयार हो जाता है | यह कर्म जाल ही संसार है यही बंधन है |

परमात्मा कहते हैं :- तुम एक चेतन आत्मा है , तेरा बंधन और मोक्ष नहीं है , तू एक है और शांत है| इसलिए अब तू नए सिरे से अपने ह्रदय को इन संकल्प विकल्प से दुखी मत कर नहीं तो फिर कर्मों के बंधन रुपी जाल में उलझ जायेगा| यह आत्मा तेरा स्वरुप है जिसे तूने प्राप्त कर लिया है अतः अब तू शांत हो कर आनंद मय हो कर अपने स्वरुप इस आत्मा में सुख पूर्वक स्थित हो|

मंत्र संग्रह

मंत्र संग्रह
गीता प्रसार  

सत्संग

सत्संग

एक श्लोकी भागवत

एक श्लोकी भागवत
आदौं देवकी देव गर्भ जननं गोपी गृह वर्धनम माया श्वान जीव ताप हरणं गोवार्धनो धारणं कंस छेदन कौरावादी हननं कुंती सुतम पालनं एतद श्री मद भागवत कथितं श्री कृष्ण लीला अमृतं<

एक श्लोकी रामायण

एक श्लोकी रामायण
आदौ राम तपोवनादि गमनं , हत्वा मृगम कांचनम वैदेहि हरणं जटायु मरणं सुग्रीव सम भाषणं बाली निर्दलम समुद्र तरणं लंकापुरी दाहनं पश्चात् रावण कुम्भकरण हननम एताधि रामायणं ||

गायत्री मंत्र

गायत्री मंत्र

|| ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्‌ ||



भावार्थ :- हम तीनों लोकों के उस वरण करने योग्य देवता की शक्तियों का ध्यान करते हैं, वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

गायत्री के पाँच मुखों का रहस्य

गायत्री के पाँच मुखों का रहस्य
शिवजी ने गायत्री के पाँच मुखों का रहस्य बताते हुए कहा

हे पार्वती! यह संपूर्ण ब्रह्मान्ड जल, वायु, पृथ्वी, तेज और आकाश के पांच तत्वों से बना है | इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राण-शक्ति के रूप में विद्यमान है | ये पांच तत्व ही गायत्री के पांच मुख हैं | मनुष्य के शरीर में इन्हें पांच कोश कहा गया है | ये पांच कोश अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश के नाम से जाने जाते हैं | ये पांच अनंत ऋद्धि सिद्धियों के अक्षय भंडार हैं | इन्हें पाकर जीव धन्य हो जाता है |

पार्वती ने पूछा
हे प्रभु ! इन्हें जाना कैसे जाता है? इनकी पहचान क्या है?

शिवजी बोले
हे पार्वती ! योग साधना से इन्हें जाना जा सकता है, पहचाना जा सकता है | इन्हें सिद्ध करके जीव भव सागर के समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है | जीवन मरण के चक्र से छूट जाता है | जीव के पांच तत्वों की श्रीवृद्धी और पुष्टि इस प्रकार से होती है - 'शरीर' की अन्न से, 'प्राण' की तेज से, 'मन' की नियंत्रण से, 'ज्ञान' की विज्ञान से और 'आनंद' की कला से | गायत्री के पांच मुख इन्हीं पांच तत्वों के प्रतीक हैं |

|| हरि तत सत ||

महा मृत्युंजय मंत्र

महा मृत्युंजय मंत्र
त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम उर्वारुकमिव बंधनान मृत्योर मुक्षीय मा अमृतात ||

भावार्थ :- " हे त्र्यम्बक वेदरूप पुण्यात्मा परमेश्वर ! मृत्यु के पाश से हमको बचाओ, जन्म-मरण से हमें मुक्त करो और हमको अमृतत्व प्रदान करो."

सप्तश्लोकी दुर्गा

सप्तश्लोकी दुर्गा
शिव जी बोले - हे देवी तुम भक्तों के लिए सुलभ हो और समस्त कर्मों का विधान करने वाली हो | कलियुग में कामनाओं की सिद्धि हेतु यदि कोई उपाय हो तो उसे अपनी वाणी द्वारा सम्यक रूप से व्यक्त करो |

देवी ने कहा - हे देव |आपका मेरे उपर बहुत स्नेह है |कलियुग में समस्त कामनाओ को सिद्ध करनेवाला जो साधन है वह बताऊंगी सुनिए ! उसका नाम है "अम्बा-स्तुति " ||

ॐ इस दुर्गा सप्त श्लोकी स्तोत्र मन्त्र के नरायण ऋषि हैं, अनुष्टुप छंद है, श्री महाकाली, महालक्ष्मी, और महासरस्वती देवता हैं, श्री दुर्गा की प्रसन्नता के लिए सप्त श्लोकी दुर्गा पाठ में इसका विनियोग किया जाता है |

वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बल पूर्वक खींच कर मोह में ड़ाल देती हैं || १ ||

माँ दुर्गे ! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्वारा चिंतन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं | दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवी ! आपके सिवा दूसरी कौन हैं, जिसका चित सबका उपकार करने के लिए सदा ही दयाद्र रहता हो || २ ||

नारायणी ! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करनेवाली मंगलमयी हो | कल्याणदायिनी शिवा हो | सब पुरुषार्थों को सिद्ध करनेवाली, शरणागत वत्सला , तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो | तुम्हे नमस्कार है || ३ ||

शरण में आये हुए दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहने वाली तथा सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवी! तुम्हे नमस्कार है|| ४ ||

सर्व स्वरुपा सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से संपन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवी ! सब भयों से हमारी रक्षा करो ; तुम्हे नमस्कार है || ५ ||

देवी तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों का नाश कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो |जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं , उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं | तुम्हारी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं ||६||

सर्वेश्वरी! तुम इसी प्रकार तीनो लोकों की समस्त बाधाओं को शांत करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो || ||

दुर्गा नाममाला

दुर्गा नाममाला
दुर्गा दुर्गार्तिशामिनी दुर्गाद्विनिवारिणी |
दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी ||

दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहंत्री दुर्गमापहा |
दुर्गमज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ||

दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी |
दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविधया दुर्गमाश्रिता ||

दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी |
दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी ||

दुर्गमासुरसहंत्री दुर्गमायुधधरिणी |
दुर्गमाङगी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी||

दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्ग दारिणी |
नामावलिमिमां यस्तु दुर्गाया मम मानवः पठेत सर्व भयनुमुक्तो भविष्यति संशयः ||

जो मनुष्य मुझ दुर्गा की इस नाममाला का पाठ करता है वह निःसंदेह सब प्रकार के भयों से मुक्त हो जाएगा |

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श्री राधाकृष्ण वंदना

श्री राधाकृष्ण वंदना




त्वं
माता कृष्ण प्राणाधिका देवी

कृष्ण प्रेममयी शक्ति शुभे
पुजितासी मया सा च या श्री कृष्णेन पूजिता
कृष्ण भक्ति प्रदे राधे नमस्ते मंगल प्रदे

हे माँ राधा, आप श्री कृष्ण के प्राण ( अधिष्ठात्री देवी ) हैं तथा आप ही श्री कृष्ण की प्रेममयी शक्ति तथा शोभा हैं. श्री कृष्ण भी जिनकी पूजा करते हैं वे देवी मेरी पूजा स्वीकार करें हे देवी राधा ! मुझे कृष्ण भक्ति प्रदान करें मेरा नमन स्वीकार करें तथा मेरा मंगल करें




हे दीनबन्धो दिनेश सर्वेश्वर नमोस्तुते
गोपेश गोपिका कांत राधा कांता नमोस्तुते


हे दीनबंधो ( दया पात्रों के मित्र ) दिनेश ( दया पात्रों के ईश्वर ) सब ईश्वरों के ईश्वर
प्रभु मेरा नमन मेरी स्तुति स्वीकार करें
आप गोपिओं के ईश्वर एवं प्राणनाथ हैं तथा श्री राधा जी आपके प्राण ( अधिष्टात्री देवी ) हैं
प्रभु मेरा नमन मेरी स्तुति स्वीकार करें

मन पर विजय कैसे प्राप्त हो ?

मन पर विजय कैसे प्राप्त हो ?
निः संदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है ; परन्तु हे मित्र यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है | श्रीमद भगवद गीता अध्याय ६ श्लोक ३५

मुस्लिम और में एक ही भगवान को मानते हे। हिन्दू धर्म मे इतने सरे देवी देवताओ को क्यों ?

मेरे इस उत्तर का उद्देश्य किसी की धार्मिकता को ठेस पहुँचाना नहीं है यदि किसी को ऐसा लगे तो मुझे क्षमा करिएँगा |

मुस्लिम धर्म की बुनियाद मोहममद साहब और क्रिश्चन धर्म की बुनियाद जिसस क्राईस्ट हैं परन्तु दोनों ही ने अपने जीवन काल में कभी यह नहीं कहा की वे स्वयं खुदा या परमेश्वर हैं बल्कि सदा यही कहा है की वे खुदा के पैगम्बर हैं या परमेश्वर के पुत्र हैं इसका अर्थ यही हुआ की परमात्मा या खुदा कहीं और है |

परन्तु जब हम सनातन धर्म की बात करे तो यहाँ ऐसे विलक्षण विभूतियों ने जनम लिया जिन्होंने सिर्फ स्वयं को परमात्मा कह कर संबोधित किया बल्कि हम आम मानवों के भी परमात्मा होने की संभावनाओ पर प्रकाश डाला

हमारे धर्म में ३३ करोड़ देवी देवताओं का विवरण आता है और इस सृष्टी में जितने भी छोटे बड़े पदार्थ हैं सभी को देवी अथवा देवता का दर्जा मिला है जिसमे की आपकी कल्पना

कल्पना कीजिये एक ऐसी कंपनी जिसमे ३३ करोड़ एम्प्लोयीस हैं तथा सब कंपनी के नियमों के तहत अपना अपना डिपार्टमेंट सम्हाल रहे हैं पर इन सब कर्मचारियों का भी जो बॉस है वह अपनी सारी जिम्मेदारियां इन कर्मचारियों के भरोसे छोड़ कर स्वयं पूर्ण रूप से मुक्त है | पर ये बॉस भी एक जिम्मेदारी का निर्वहन करते हैं और वह है अपने भक्तों की जिम्मेदारी | यह डिपार्टमेंट उन्होंने स्वयं के लिए रख छोड़ा है क्यूंकि

तपस्या किसे कहते हैं ?

तपस्या किसे कहते हैं ?
देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन,पवित्रता , सरलता, ब्रह्मचर्य , और अहिंसा यह शरीर सम्बन्धी तप है |

जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय, और हित कारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद शास्त्रों के पढने का एवं परमेश्वर के नाम-जप कारक अभ्यास है, वही वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है |

और मन की प्रसन्नता, शांत भाव, भगवान का चिंतन करने का स्वाभाव, मन का निग्रह एवं अंतःकरण के भावों की भली-भांति पवित्रता इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है |

योगी की परिभाषा

योगी की परिभाषा
जो साधक इस जीवन में शारीर का नाश होने से पहले ही काम-क्रोध से उत्पन होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है , वही पुरुष योगी है और वही सुखी है |

यज्ञ से परमात्मा कैसे प्राप्त हों ?

यज्ञ से परमात्मा कैसे प्राप्त हों ?
जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्त्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किया जाने वाला द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्म रुपी कर्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि में आहुति देने रुपी क्रिया भी ब्रह्म है उस ब्रह्म कर्म में स्तिथ रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किये जाने वाला फल भी ब्रह्म है |

परमात्मा के दर्शन कैसे हों ?

परमात्मा  के दर्शन कैसे हों ?
जो पुरुष परमात्मा ही सब कुछ हैं ऐसे भाव में स्थित होकर संपूर्ण जीवों की आत्मा के रूप में स्थित मुझ परमेश्वर को ही देखता है और संपूर्ण जीव मेरे द्वारा ही बनाये गए हैं तथा मैं ही सबकी आत्मा हूँ ऐसा मानता है उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता एवं वह भक्त कभी मेरे लिए अदृश्य नहीं होता है |


मैं सब भूतों के हृदय में स्तिथ सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य तथा अंत भी मैं ही हूँ

मैं ही सब प्राणियों के ह्रदय में अंतर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विचार के द्वारा बुद्धि में रहने वाले संशय होते हैं और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ तथा वेद ,वेदों का अंत कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ

मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों को भोगने वाला, संपूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर, तथा संपूर्ण भूत प्राणियों का सुह्र्द अर्थात स्वार्थ रहित दयालु और प्रेमी ऐसा तत्व से जानकर शांति को प्राप्त होता है |

अथवा इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है मैं इस संपूर्ण जगत को अपनी योग शक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ