नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावाली) (२२ अक्टूबर २०१४ विशेष)


नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावाली) 
                                                     
कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को नरक चतुर्दशी या नरक चौदस के रूप में मनाने की परम्परा है। इसे यम चतुर्दशी व रूप चतुर्दशी भी कहते हैं।  इस बार यह पर्व 12 नवम्बर सोमवार को मनाया जाएगा।इस दिन यमराज की पूजा व व्रत का विधान है।   कुछ जगहों पर यह पर्व छोटी दीपावली के रूप में तथा अधिकांश स्थानों पर हनुमान जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन कुबेर की भी पूजा की जाती है। इस तिथि को रूप चैदस के रूप में भी मनाने की परंपरा है। प्रातः काल सूर्योदय से पहले उठकर तुंबी (लौकी) को सिर से घुमाने के बाद स्नाना करने से रूप और सौंदर्य बना रहता है तथा लोग नरकगामी होने से भी बच जाते हैं। यह भी मान्यता है कि भगवान ने इसी दिन वामन के रूप में अवतार लिया था। इस दिन दान आदि करने से लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन निशामुखी वेला में दीपदान भी करना चाहिए।

कथा 


इस दिन को दीपावली की तरह मनाए जाने के संदर्भ में पौराणिक मान्यता है कि प्रागज्योतिषपुर में नरकासुर नामक राजा राज करता था। एक युद्ध के दौरान उसने देवराज इन्द्र को पराजित कर देवताओं और संतो की 16 हजार पुत्रियों को बन्दी बना लिया।

माता अदीति देवलोक की माता मानी जाती हैं। वह भगवान कृष्ण की पत्नी सत्यभामा की समधि भी थीं। जब सत्यभामा को इस घटना के बारे में पता चला तो क्रोधित हो उन्होनें भगवान कृष्ण से नरकासुर को खत्म करने की अनुमति मांगी। नरकासुर को किसी औरत के हाथ मृत्यु का श्राप मिला था। इसलिए श्रीकृष्ण ने सत्यभामा को नरकासुर के वध का अवसर दिया। सत्यभामा ने सारथी कृष्ण की सहायता से नरकासुर को मार डाला। नरकासुर के मरने के बाद सभी देवियों को नरकासुर की कैद से मुक्ति मिल गई। उन देवियों का खोया हुआ सम्मान लौटाने के लिए भगवान कृष्ण ने उन्हें पत्नी के रुप में स्वीकार किया। अगले दिन सुबह कृष्ण के शरीर से दानवराज नरकासुर के खून की दुर्गन्ध दूर करने के लिए उनकी पत्नियों ने उन्हें सुगन्धित जल से स्नान करवाया। लोकमान्यता है कि तभी से इस दिन स्नान करने की परम्परा का विकास हुआ।

इस घटना की स्‍मृति में प्रायद्वीपीय भारत के लोग सूर्योदय से पहले उठ जाते हैं, व कुमकुम अथवा हल्‍दी के तेल में मिलाकर नकली रक्‍त बनाते हैं। राक्षस के प्रतीक के रूप में एक कड़वे फल को अपने पैरों से कुचलकर वे विजयोल्‍लास के साथ रक्‍त को अपने मस्‍तक के अग्रभाग पर लगाते हैं। तब वे धर्म-विधि के साथ तैल स्‍नान करते हैं, स्‍वयं पर चन्‍दन का टीका लगाते हैं। मन्दिरों में पूजा अर्चना के बाद फलों व बहुत सी मिठाइयों के साथ बड़े पैमाने पर परिवार का जलपान होता है।

कथा : २ 
जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर दैत्यराज बलि से तीन पग धरती मांगकर तीनों लोकों को नाप लिया तो राजा बलि ने उनसे प्रार्थना की- 'हे प्रभु! मैं आपसे एक वरदान मांगना चाहता हूं। यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो वर देकर मुझे कृतार्थ कीजिए।

तब भगवान वामन ने पूछा- क्या वरदान मांगना चाहते हो, राजन? दैत्यराज बलि बोले- प्रभु! आपने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से लेकर अमावस्या की अवधि में मेरी संपूर्ण पृथ्वी नाप ली है, इसलिए जो व्यक्ति मेरे राज्य में चतुर्दशी के दिन यमराज के लिए दीपदान करे, उसे यम यातना नहीं होनी चाहिए और जो व्यक्ति इन तीन दिनों में दीपावली का पर्व मनाए, उनके घर को लक्ष्मीजी कभी न छोड़ें।

राजा बलि की प्रार्थना सुनकर भगवान वामन बोले- राजन! मेरा वरदान है कि जो चतुर्दशी के दिन नरक के स्वामी यमराज को दीपदान करेंगे, उनके सभी पितर लोग कभी भी नरक में न रहेंगे और जो व्यक्ति इन तीन दिनों में दीपावली का उत्सव मनाएंगे, उन्हें छोड़कर मेरी प्रिय लक्ष्मी अन्यत्र न जाएंगी।

भगवान वामन द्वारा राजा बलि को दिए इस वरदान के बाद से ही नरक चतुर्दशी के व्रत, पूजन और दीपदान का प्रचलन आरंभ हुआ, जो आज तक चला आ रहा है।

पूजन विधि



छोटी दीपावली की सायंकाल भी दीपावली की तरह ही इस दिन भी दीप प्रज्वलित किए जाते हैं। इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर तेल उबटन से मालिश करके चिचड़ी की पत्तियां जल में डालकर स्नान का विधान है। ऐसा करने से नरक से मुक्ति मिलती है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करने का भी विधान बताया गया है क्योंकि इसी दिन उन्होंने नरकासुर का वध किया था। स्नान के पश्चात विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान की आराधना अत्यन्त पुण्यदायक मानी गई है। इससे पाप कटता है और सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।

नरक चैदस के दिन संध्या के समय स्त्रान कर घर के कुल देवता की पूजा की जाती है। इस दिन घर के देवताओं और पुरखों की पूजा भी की जाती है। उन्हें नैवेद्य चढ़ाते हैं और उनके सामने दीप जलाते हैं। ऐसा माना जाता है कि नरक चैदस को पूजा के दौरान घर-परिवार से नरक अर्थात् दुरूखकृविपदाओं को बाहर किया जाता है। घर के आंगन, बरामदे और द्वार को रंगोली से सजाया जाता है।




इस दिन शरीर पर तिल के तेल की मालिश करके सूर्योदय के पूर्व स्नान करने का विधान है। स्नान के दौरान अपामार्ग (एक प्रकार का पौधा) को शरीर पर स्पर्श करना चाहिए। अपामार्ग को निम्न मंत्र पढ़कर मस्तक पर घुमाना चाहिए-
सितालोष्ठसमायुक्तं सकण्टकदलान्वितम्।
हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाण: पुन: पुन:।।

स्नान करने के बाद शुद्ध वस्त्र पहनकर, तिलक लगाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके निम्न मंत्रों से प्रत्येक नाम से तिलयुक्त तीन-तीन जलांजलि देनी चाहिए। यह यम-तर्पण कहलाता है। इससे वर्ष भर के पाप नष्ट हो जाते हैं-
ऊँ यमाय नम:
ऊँ धर्मराजाय नम:
ऊँ मृत्यवे नम:
ऊँ अन्तकाय नम:
 ऊँ वैवस्वताय नम:
 ऊँ कालाय नम:
ऊँ सर्वभूतक्षयाय नम:
 ऊँ औदुम्बराय नम:
ऊँ दध्राय नम:
ऊँ नीलाय नम:
 ऊँ परमेष्ठिने नम:
ऊँ वृकोदराय नम:
ऊँ चित्राय नम:
ऊँ चित्रगुप्ताय नम:।

इस प्रकार तर्पण कर्म सभी पुरुषों को करना चाहिए, चाहे उनके माता-पिता गुजर चुके हों या जीवित हों। फिर देवताओं का पूजन करके सायंकाल यमराज को दीपदान करने का विधान है।दीपक जलाने का कार्य त्रयोदशी से शुरू करके अमावस्या तक करना चाहिए। इस दिन जो भी व्यक्ति विधिपूर्वक भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करता है, उसके मन के सारे पाप दूर हो जाते हैं और अंत में उसे बैकुंठ में जगह मिलती है।विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति को मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं और उसका जीवन नरक की यातनाओं से मुक्त हो जाता है।





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