जब तक हम अपने अंहकार का संहार नही करेंगे, शांति नहीं पा सकेंगे. आध्यात्म से अंहकार को गलाने के कई तरीके है. उनमे से एक है काल के प्रति अनुभूति बनाये रखना. मृत्यु आनी है और एक दिन सबकुछ यहीं छूट जाना है, फिर कैसा मेरा-तेरा. यह बोध अंहकार को समाप्त करने में सहायक है. काल का भय मनुष्य को अंहकार से जोड़कर रखता है. जब तक अंहकार है, परमात्मा से मिलने कि सम्भावना नहीं है. जिसका ऐसा भय जाता रहा, उसका अंहकार जाता रहा. अहंकार को आदत होती है कदिन में प्रवेश करने की, लेकिन परमात्मा सरलतम है, उसे पाना हो तो सरल होना पड़ेगा. हम अपने आप को परमात्मा से अलग मानते है और यहीं से भटकाव शुरू हो जाता है. इस भिन्नता में ही अंहकार है. सच तो यह है कि जैसे पानी की एक बूँद में पूरा सागर समाया है, वैसे ही हमारे क्षुद्र रूप में परमात्मा का विराट स्वरुप समाया है. परमात्मा में घोल लें स्वयं को. जब भक्त और भगवान एक-दुसरे में समां जायें तो फिर काल का डर कैसा, यहीं से अंहकार भी समाप्त हो जाता है. डर ना हो तो जरा मुस्कुराइए. .......राधे-राधे
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