जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय, और हित कारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद शास्त्रों के पढने का एवं परमेश्वर के नाम-जप कारक अभ्यास है, वही वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है |
और मन की प्रसन्नता, शांत भाव, भगवान का चिंतन करने का स्वाभाव, मन का निग्रह एवं अंतःकरण के भावों की भली-भांति पवित्रता इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है |
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